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घोटाले में डूब गई कांग्रेस

Fri, 20 May 2016 11:06 AM IST
सुदीप ठाकुर/ अमर उजाला, दिल्ली

सार

  • माकपा दिग्गजों वीएस-पिनरायी की जोड़ी भारी पड़ी चांडी पर
  • पहली बार भाजपा ने खोला खाता,  
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एलडीएफ
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विस्तार
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बीसवीं सदी के मलयाली जनकवि कुमारन आशान की कविता की एक पंक्ति है, 'अपने नियमों को बदलो, नहीं तो तुम्हारे नियम तुम्हें बदल देंगे।' केरल 'नियमसभा' यानी विधानसभा चुनाव के नतीजे बताते हैं कि निवर्तमान मुख्यमंत्री ओमन चांडी और कांग्रेस न तो अपने नियम बदलने को तैयार हैं, न ही खुद को! दूसरी ओर केंद्रीय राजनीति पर हाशिये पर जा रहे वाम दलों को केरल ने नई ताकत दी है, जहां उन्होंने यूडीएफ के मुकाबले तकरीबन दोगुनी सीटें जीतकर वापसी की है।
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विधानसभा नतीजे केरल की पारंपरिक राजनीति के अनुरूप ही हैं, जहां हर पांच वर्ष में यूडीएफ और एलडीएफ के बीच सत्ता बदल जाती है। सिर्फ एंटी इन्कंबेंसी ही नहीं, चांडी सरकार के कार्यकाल के दौरान हुए घोटालों ने भी यूडीएफ की पराजय सुनिश्चित की। पहले सोलर लैंप घोटाला सामने आया, जिसमें सेक्स रैकेट तक के आरोप लगे। उसके बाद नई शराब नीति के नाम पर घोटाला सामने आया, जिसमें चांडी सरकार के आबकारी मंत्री के बाबू पर एक बड़े शराब कारोबारी ने दस करोड़ रुपये रिश्वत लेने के आरोप लगाए।

कोच्चि जिले में विगत पांच बार से चुनाव जीतने वाले के बाबू इस बार हार गए। वास्तव में शराब नीति के नाम पर पांच सितारा होटलों को छोड़कर छोटे होटलों और बार में शराब की बिक्री पर रोक लगा दी गई। कांग्रेस के सूत्र बताते हैं कि इसका असर यहां तक हुआ कि कांग्रेस को चंदा देने वाली शराब लॉबी तक ने हाथ खींच लिए, जिससे आखिर में कई उम्मीदवारों के हाथ तंग हो गए थे। 
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दलित छात्रा से बलात्कार के मामला ने भी सरकार को कटघरे में किया खड़ा

kerala rape case - फोटो : bbc
कोच्चि जिले के पेरंबवूर में एक दलित छात्रा जिशा की बलात्कार के बाद हुई हत्या की घटना ने भी चांडी के खिलाफ विपक्ष को बड़ा मुद्दा दे दिया। कांग्रेस अपनी भीतरी गुटबाजी को भी नहीं छिपा सकी। चुनाव के दौरान ही गृह मंत्री रमेश चेनिथल्ला के समर्थक उन्हें अगले मुख्यमंत्री के तौर पर देख रहे थे, तो त्रिशुर में एंटनी और थरूर गुटों के बीच खींचतान थी।

ध्यान रहे, त्रिशुर में पूर्व मुख्यमंत्री के करुणाकरण की बेटी पद्मजा वेणुगोपाल चुनाव हार गईं। यूडीएफ सरकार के खिलाफ एंटी इन्कंबेंसी और भ्रष्टाचार तो बड़े कारण थे ही, लेफ्ट ने जिस रणनीतिक तैयारी के साथ चुनाव लड़ा, उससे भी उसकी राह आसान हुई।

असल में चुनाव से ऐन पहले 93 वर्षीय वी एस अच्युतानंदन और माकपा के पूर्व राज्य सचिव पिनरायी विजयन ने आपसी मतभेद भुलाकर जिस एकजुटता का परिचय दिया, उससे भी लेफ्ट के कार्यकर्ताओं और समर्थकों में अच्छा संदेश गया। हालांकि अब जीत के बाद मुख्यमंत्री पद को लेकर उनके बीच फिर से टकराव देखने को मिल सकता है। 
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कन्हैया के दोस्त मुहसिन को मिली जीत

Kerala election - फोटो : bbc
केरल के साथ जिन और राज्यों में चुनाव हुए, वहां के बारे में तो पता नहीं, लेकिन जेएनयू और रोहित वेमुला की आत्महत्या जैसे मुद्दों ने यहां कुछ असर दिखाया है। नतीजतन जेएनयू छात्रसंघ अध्यक्ष कन्हैया का दोस्त मुहसिन पलकड़ में पटांबी सीट से चुनाव जीत गया। इस चुनाव का एक बड़ा संदेश यह भी है कि इस दक्षिणी तट पर भाजपा ने पहली बार अपना खाता खोला है।

बरसों से संघर्ष कर रहे तिरुवनंतपुरम की नेमम सीट से 86 वर्षीय ओ राजगोपाल ने सीपीएम के शिवनकुट्टी को पराजित कर दिया। यही नहीं, भाजपा ने तकरीबन आधा दर्जन सीटों पर दूसरे स्थान पर रहकर यह जताने की कोशिश की है कि केरल की दो ध्रुवीय राजनीति में वह तीसरा ध्रुव बन सकती है। मगर जिस भारत धर्म जन सेना (बीडीजेस) को लेकर काफी चर्चा थी, उसका कुछ असर नहीं दिखा। यही नहीं जिस इड़वा समुदाय में बीडीजेएस की पैठ मानी जा रही थी, उसने भी लेफ्ट पार्टियों को वैसा नुकसान नहीं पहुंचाया जैसी उम्मीद की जा रही थी। बल्कि पारंपरिक रूप से कांग्रेस और आईयूएमएल समर्थक माने जाने वाले ईसाई और मुस्लिम मतदाता भी केरल में भाजपा के बढ़ते प्रभाव की वजह से माकपा की ओर झुक गए हों तो आश्चर्य नहीं।  

तिरुवनंतपुरम सेंट्रल से भाजपा उम्मीदवार के रूप में चुनाव हार चुके क्रिकेटर श्रीसंत के प्रचार के दौरान एक मतदाता ने इस संवाददाता से कहा था, 'यहां तो पांच साल यूडीएफ और पांच साल लेफ्ट की सरकार बनती है। यह केरल का स्टाइल है।' देखने वाली बात यह है कि भाजपा केरल की इस स्टाइल को कितना बदल पाती है।
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