भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) के खिलाफ 6 दलों के साथ मिल कर महाभियोग का नोटिस देने वाली कांग्रेस घर में ही घिर गई है। पार्टी में न सिर्फ इसके लिए चुने गए समय पर सवाल उठ रहे हैं, बल्कि पक्ष और विपक्ष में दो धड़े भी बन गए हैं। टीएमसी, डीएमके के सीजेआई के खिलाफ सबूत मांगने, आरजेडी की पूरी मुहिम से दूरी बनाते ही इस मामले में विपक्षी एकता भी धराशाई हो गई है। इन सबके बीच सबकी निगाहें अब राज्यसभा के सभापति वैंकेया नायडू के फैसले पर है। सभापति को महाभियोग का नोटिस खारिज करने का अधिकार है।
सीजेआई के खिलाफ अचानक महाभियोग प्रस्ताव लाने के फैसले के बाद अब कांग्रेस कई तरह की आशंकाओं से घिर गई है। शनिवार को वरिष्ठ नेता सलमान खुर्शीद और अभिषेक मनु सिंघवी की इस मुहिम से दूरी बनाने, पूर्व पीएम मनमोहन सिंह का नोटिस पर हस्ताक्षन न होने से पार्टी में फूट का संदेश गया था। अब पार्टी में एक धड़ा नोटिस दिए जाने केसमय पर सवाल उठा रहा है।
इस धड़े का कहना है कि अगर महाभियोग प्रस्ताव का नोटिस देना ही था तो इसके लिए जनवरी का महीना उचित समय था, जब सुप्रीम कोर्ट के 4 सीनियर जजों ने सीजेआई के खिलाफ मोर्चा खोला था। अगर उसी दौरान फैसला ले लिया गया होता तो देश में यह संदेश नहीं जाता कि कांग्रेस जस्टिस लोया की मौत के मामले में मनमाफिक फैसला चाहती थी। पार्टी को महाभियोग मामले में भाजपा द्वारा कर्नाटक चुनाव में लाभा उठाने और इसे राम मंदिर के फैसले से जोड़े जाने का भी भय सता रहा है। अंदरखाने महाभियोग पर पार्टी में चर्चा न किए जाने पर भी सवाल उठ रहे हैं।
संगठन में बदलाव भी है विवाद का कारण
भले ही पार्टी में मतभेद के सुर महाभियोग के सवाल पर उठ रहा है, मगर इसका बड़ा कारण नए अध्यक्ष राहुल गांधी की टीम का निर्माण किया जाना है। राहुल के हाथ में कमान आने के बाद पूर्ववर्ती अध्यक्ष सोनिया गांधी खेमे केकई नेता किनारे कर दिए गए हैं। पहले संगठन में जिन जनार्दन द्विवेदी, अहमद पटेल, सलमान खुर्शीद, अभिषेक मनु सिंघवी जैसे दर्जनों नेताओं की तूती बोलती थी, उनकी जगह दूसरे चेहरों ने ले ली है।
निगाहें सभापति नायडू पर
महाभियोग मामले में अब सबकी निगाहें राज्यसभा के सभापति वैंकया नायडू पर है। संविधान में सभापति को महाभियोग प्रस्ताव के नोटिस को खारिज करने का अधिकार है। संविधान विशेषज्ञ सुभाष कश्यप कहते हैं सभापति नोटिस के औचित्य पर सवाल उठाते हुए इसे खारिज कर सकते हैं। क्योंकि प्रथम दृष्यया ही यह मामला राजनीतिक लगता है। फिर इससे पहले आए महाभियोग मामले की तरह इस मामले में चुनिंदा विपक्ष ही सीजेआई के खिलाफ हैं।
लोकसभा में तो नोटिस देने वाले दलों की स्थिति और दयनीय है। गौरतलब है कि सभापति की ओर से नोटिस को स्वीकार किए जाने के बाद भी पहले तीन सदस्यीस समिति सीजेआई के खिलाफ लगाए गए आरोपों की जांच करेगी। समिति द्वारा आरोप सही पाए जाने संबंधी रिपोर्ट देने के बद ही इस पर चर्चा और मतदान की प्रक्रिया शुरू की जा सकती है।