अधिकारियों ने बताया कि एजेंसी ने आरोप लगाया है कि लाइब्रेरियन, एमबीबीएस डॉक्टरों और तकनीकी अधिकारियों सहित अपात्र व्यक्तियों को उनके योगदान के बिना पैसे का भुगतान किया गया था। केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) ने कहा कि उन्हें विभिन्न कंपनियों द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले कोयले की गुणवत्ता की जांच के लिए परियोजनाओं में पैसे का भुगतान किया गया था, जबकि उनका नवोन्मेषकों (इनोवेटर्स) और प्रमुख योगदानकर्ताओं की श्रेणी में कोई योगदान नहीं था।
आरोप है कि एसके सिंह को कोयला परियोजनाओं के बौद्धिक शुल्क (इंटेलेक्चुअल फी) से 15.36 करोड़ रुपये मिले जबकि एके सिंह ने 9.04 करोड़ रुपये प्राप्त किए। उन्होंने सीआईएस के दिशानिर्देशों का उल्लंघन करते हुए 2005 और 2017 में तकनीकी हस्तांतरण (टेक्नोलॉजी ट्रांसफर) और जानकारी के आधार पर यह पैसा हासिल किया।
कोयला, बिजली और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्री की अध्यक्षता में 28 अक्तूबर, 2015 को हुई बैठक में सीएसआईआर-सीआईएमएफआर को बिजली कंपनियों और कोयला कंपनियों द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले कोयले के नमूने और विश्लेषण के लिए तीसरे पक्ष की नमूना एजेंसी के रूप में नियुक्त किया गया था।
प्राथमिकी में कहा गया है कि संस्थान द्वारा कोयला उत्पादकों और बिजली कंपनियों के साथ 10 साल के कार्यकाल के लिए चार समझौता ज्ञापनों पर हस्ताक्षर किए गए थे, जिन्हें आपसी सहमति पर पांच साल और बढ़ाया जा सकता था। इस समझौते में विशेष रूप से वार्षिक आधार पर नमूना लिए जाने वाले कोयले की गुणवत्ता का जिक्र किया गया था और कम अवधि के लिए विभिन्न परियोजनाओं में समझौते के किसी भी सब-डिवीजन को तय नहीं किया गया था। सीएसआईआर-सीआईएफएमआर द्वारा कई करारों को एक परियोजना में मिलाकर 304 कोयला-नमूना परियोजनाएं सृजित की गई थीं।
सीबीआई ने आरोप लगाया है कि पीके सिंह और एके सिंह ने एक साजिश रची, जिसके कारण 2016 और 2021 के बीच कोयला-नमूना परियोजनाओं के तहत सीआईएफएमआर के वैज्ञानिकों, तकनीकी अधिकारियों और प्रशासनिक कर्मचारियों को मानदेय, बौद्धिक शुल्क और परियोजना शुल्क के रूप में 137.79 करोड़ रुपये वितरित किए गए।