फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

गंगा की सफाई और मोदी के लिए उसका अर्थ

Sat, 28 May 2016 06:29 PM IST
जस्टिन रॉलैट/दक्षिण एशिया संवाददाता, बीबीसी

सार

  • प्रदूषण के बावजूद भी गंगा अद्भुत जंतुओं को जिंदा रख सकती है
  • मैं सोचता हूं कि एक दिन हम प्राचीन काल की गंगा देख पाएंगे 
विज्ञापन
डॉल्फिन - फोटो : BBC
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर से मिलने और उनके आश्वासनों के बावजूद मैं गंगा की बदहाली और इसे सुधारने की कोशिशों के हश्र को देखकर बहुत उत्साहित नहीं था। लेकिन एक खास घटना ने मुझे गंगा की सफाई को लेकर सकारात्मक होने पर मजबूर कर दिया। इसकी शुरुआत होती है वर्ल्ड वाइड फंड की ओर से गंगा में डॉल्फीन देखने के आमंत्रण के साथ। इस असधारण जंतु पर विलुप्त होने का खतरा मंडरा रहा है।
विज्ञापन


1980 के दशक में भारत में इसकी संख्या 5000 तक गिनी गई थी लेकिन डब्लूडब्लूएफ के हाल के सर्वे में इसकी संख्या 2000 से भी कम बची हुई पाई गई है। जब मैंने दिल्ली में अपने एक पत्रकार मित्र के साथ डॉल्फिन देखने की इच्छा जाहिर की तो उसने कहा कि डाल्फिन मुश्किल से दिखती है। उसने बताया कि गंगा की डॉल्फिन समुद्री डाल्फिनों की तरह उछलने-कूदने वाली नहीं होती है। तुम अगर उनकी पीठ से ज्यादा कुछ देख पाओ तो किस्मतवाले होगे। डाल्फिन देखने की मेरी उम्मीद करीब-करीब धाराशायी हो गई थी और मैं डब्लूडब्लूएफ की ओर से आगे की जानकारी मिलने का इंतजार कर रहा था। मैं उम्मीद कर रहा था कि डॉल्फिन देखने के लिए मुझे उन ऊंचाई वाले इलाकों में जाना होगा जहां गंगा का पानी साफ होता है लेकिन उन्होंने मुझे इलाहाबाद आने को कहा।

यह शहर उन शहरों में है जहां गंगा का पानी सबसे गंदा है। मैं अपने कैमरा टीम के साथ एक छोटे से गांव में पहुंचा। हमें 10 बजे सुबह गंगा किनारे पहुंचने को कहा गया क्योंकि डॉल्फिन सुबह के वक्त ज्यादा सक्रिय रहती है। मैं लंबे वक्त तक इंतजार करने की पूरी तैयारी कर के गया था। लेकिन जैसे ही मैं गंगा के किनारे रेत पर पहुंचा मैंने देखा कि कोई चीज सतह पर आकर टकरा रही है। मैंने भौंचक्का होकर पूछा, "क्या ये डॉल्फिन थी?" डब्लूडब्लूएफ के असगर नवाब ने मुझसे कहा हां, ये डॉल्फिन ही थी।
विज्ञापन


उन्होंने मुझे बताया कि हर एक-दो मिनट पर डॉल्फिन को सांस लेने की जरूरत पड़ती है इसलिए वे लगातार सतह के किनारे आती रहती हैं। डॉल्फिन को देखना और उसकी तस्वीर ले पाना बिल्कुल जुदा बातें हैं। लेकिन किस्मत से बीबीसी के होनहार कैमरामैन संजय गांगुली मेरे साथ थे। मैं उस लम्हें को कभी नहीं भूलूंगा जब एक साथ सात डॉल्फिन मेरे नाव के नजदीक एक के बाद एक करके कूद रही थीं। दो घंटे के बाद हमारे पास इस अद्भुत जंतु के कुछ जबरदस्त तस्वीरें मौजूद थीं। लेकिन इसके बाद मुझे लगा कि प्रदूषण के बावजूद भी गंगा इन अद्भुत जंतुओं को जिंदा रख सकती है और मैं एक बार फिर इस बात के महत्व को समझ पाया कि क्यों गंगा नदी को साफ करने की भारत सरकार की कोशिशें सफल होनी चाहिए। 
विज्ञापन

मैं सोचता हूं कि एक दिन हम प्राचीन काल की गंगा देख पाएंगे 

स्वामी चिदानंद
मेरा आखिरी पड़ाव गंगासागर था जहां बंगाल की खाड़ी में गंगा हिंद महासागर से आकर मिलती है। यह एक और पवित्र स्थल था जहां मैं सलाना मेला के दौरान पहुंचा। इस जगह के बारे में यह माना जाता है कि यहां गंगा स्वर्ग से अवतरित होती है। यहां दस लाख से ज्यादा लोग गंगा के पवित्र लेकिन प्रदूषित पानी में डूबकी लगाने आते हैं।

महाकुंभ के दौरान 2013 में इलाहाबाद में 12 करोड़ लोग गंगा में डूबकी लगाने पहुंचे थे। हर बारह साल पर महाकुंभ मनाया जाता है। इतनी बड़ी संख्या को देखकर आसानी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि हिंदुओं के लिए गंगा का कितना महत्व है और ये यह बताने के लिए भी काफी है कि क्लिन गंगा मिशन सरकार के लिए कितनी अहमियत रखती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस बात को बहुत अच्छे से जानते हैं कि उनकी कामयाबी और नाकामयाबी को इस मिशन की सफलता से ही तौला जाएगा।

गंगा को साफ करने की उनकी कोशिश भारत के आधुनिक होने की क्षमता की परीक्षा है। इससे भ्रष्टाचार, पर्याप्त तरीके से नियमन और साथ ही साथ वाटर ट्रीटमेंट में बड़े पैमाने पर निवेश करने की भारत की क्षमता का अंदाजा लगेगा। बहुत सारे भारतीय उन्हें सफल होते हुए देखना चाहते हैं। गंगा के तट पर मेरी मुलाकात स्वामी चिदानंद से दोबारा हुई। मैं उनसे ऋषिकेश में मिल चुका था। उन्होंने विश्वास जताया कि परिवर्तन होगा।

वो कहते हैं, "मैं सोचता हूं कि एक दिन हम प्राचीन काल की गंगा देख पाएंगे और ऐसा इसलिए नहीं होगा कि राजनेता चाहेंगे बल्कि दूसरे लोग और शुभचिंतक भी इसके लिए एक साथ आएंगे। क्योंकि यह नदी सबकी है। हम सबको इसके लिए एक होना चाहिए। मुझे बहुत उम्मीद है कि एक दिन ऐसा होगा।" हम भी उम्मीद करते हैं क्योंकि अगर भारत दुनिया की सबसे प्रदूषित नदियों में से एक को साफ कर सकती है तो कौन जानता है कि बढ़ता हुआ यह भारत और क्या-क्या हासिल कर सकता है?
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें