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CJI UU Lalit: मुख्य न्यायाधीश बोले- अदालतें अब मामलों के निपटारे को अधिक से अधिक महत्व दे रहीं, यह बात भी कही

Fri, 02 Sep 2022 09:45 PM IST
अभिषेक दीक्षित न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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CJI UU Lalit - फोटो : ANI
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बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने शुक्रवार को सीजेआई यूयू ललित के लिए सम्मान कार्यक्रम का आयोजन किया। इस दौरान  सीजेआई यूयू ललित ने कहा कि मैं लोगों की अपेक्षाओं को पूरा करने की पूरी कोशिश करूंगा। मैंने कार्यभार ग्रहण करने से पहले के समय की तुलना में मामलों को सूचीबद्ध किया है। पिछले चार दिनों में मेरे सचिव ने मेरे सामने आंकड़े रखे हैं। उन्होंने कहा कि अदालत ने चार दिनों में 1,293 के भ्रामक मामलों का निपटारा किया है। आप कल्पना करते हैं कि अदालतें अब मामलों के निपटारे को अधिक से अधिक महत्व दे रही हैं।

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मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि उनके महासचिव ने पिछले चार दिनों का एक आंकड़ा पेश किया है। इससे यह साफ हो जाता है कि सुप्रीम कोर्ट ने 1,293 भ्रामक मामले और 440 स्थानांतरण मामलों का निपटारा किया है। पिछले दो दिनों में 106 नियमित मामलों का भी निस्तारण कर दिया गया है। हम नियमित मामलों के निस्तारण पर ज्यादा से ज्यादा फोकस कर रहे हैं। सीजेआई ने बार काउंसिल के कार्यक्रम के दौरान यह भी भरोसा दिलाया कि सुप्रीम कोर्ट मामले को तेजी से निपटाने की कोशिश करेगा। लोगों की उम्मीदों पर खरा उतरने की पूरी कोशिश की जाएगी।

इससे पहले 27 अगस्त को देश के मुख्य न्यायाधीश के रूप में जस्टिस यूयू ललित ने शपथ ली थी। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू उन्हें मुख्य न्यायाधीश पद की शपथ दिलाई थी। यह कार्यक्रम राष्ट्रपति भवन में आयोजित हुआ था। जस्टिस ललित भारत के 49वें चीफ जस्टिस हें। शपथग्रहण समारोह में उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कई अन्य केंद्रीय मंत्री शामिल हुए थे।
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कई अहम फैसलों का हिस्सा रहे हैं जस्टिस ललित

  • जस्टिस यूयू ललित सुप्रीम कोर्ट के कई ऐतिहासिक फैसलों का हिस्सा रहे हैं। तीन तलाक को असंवैधानिक करार देने वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ के भी सदस्य थे। जस्टिस ललित की अध्यक्षता वाली एक पीठ ने त्रावणकोर के तत्कालीन शाही परिवार को केरल के ऐतिहासिक श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर का प्रबंधन करने का अधिकार दिया था। यह सबसे अमीर मंदिरों में से एक है।
  • जस्टिस ललित की पीठ ने ही ‘स्किन टू स्किन टच’ पर फैसला दिया था। इस फैसले में माना गया था कि किसी बच्चे के शरीर के यौन अंगों को छूना या ‘यौन इरादे’ से शारीरिक संपर्क से जुड़ा कृत्य पॉक्सो अधिनियम की धारा-7 के तहत ‘यौन हमला’ ही माना जाएगा। पॉक्सो अधिनियम के तहत दो मामलों में बॉम्बे हाईकोर्ट के विवादास्पद फैसले को खारिज करते हुए जस्टिस ललित की पीठ ने कहा था कि हाईकोर्ट का यह मानना गलती था कि चूंकि कोई प्रत्यक्ष ‘स्किन टू स्किन’ संपर्क नहीं था इसलिए यौन अपराध नहीं है।
  • जस्टिस ललित उस पीठ में भी थे, जिसने कहा था कि हिंदू विवाह अधिनियम की धारा-13 बी (2) के तहत आपसी सहमति से तलाक के लिए निर्धारित छह महीने की प्रतीक्षा अवधि अनिवार्य नहीं है। हाल ही में जस्टिस ललित की अध्यक्षता वाली पीठ ने भगोड़े शराब कारोबारी विजय माल्या को अदालत की अवमानना के आरोप में चार महीने के कारावास और 2000 रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई थी।
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