नागरिक अधिकार कानून, 1955 और आईपीसी के अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति को न्याय दिलाने में नाकाम रहने के बाद एससी/एसटी कानून लगाया गया था। सरकार ने 1989 में दलितों पर होने वाले अत्याचारों को रोकने के लिए एससी/एसटी अत्याचार निवारण कानून बनाया था। 11 सितंबर, 1989 को संसद ने इसे पारित किया और 30 जनवरी, 1990 से इसे लागू कर दिया गया।
कानून के तहत अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों को जाति सूचक शब्द बोलना या उन्हें किसी भी प्रकार से प्रताड़ित करने को अपराध माना जाता है। यह कानून जम्मू-कश्मीर में लागू नहीं है। ज्यादा प्रभावशाली बनाने के लिए सरकार ने 2015 में कानून में बदलाव किया था, जो 26 जनवरी, 2016 को लागू हो गया था। इस कानून में पांच अध्याय और 23 धाराएं हैं। यह कानून पीड़ित को विशेष अधिकार देता है। पीड़ित को 75 हजार से लेकर 8.5 लाख रुपये तक की सहायता दी जाती है। कानून में छह महीने से उम्र कैद तक की सजा का प्रावधान है। सरकारी अधिकारी के मामले में 6 महीने से एक साल तक की सजा का प्रावधान है।
सुप्रीम कोर्ट ने फैसले में किया था बदलाव
सुप्रीम कोर्ट ने 20 मार्च को दिए अपने एक फैसले में एससी/एसटी कानून में बदलाव किया था। कोर्ट ने आदेश में कहा था कि शिकायत के आधार पर तुरंत गिरफ्तारी नहीं की जानी चाहिए। इससे पहले आरोपों की जांच जरूरी है। अगर अभियुक्त सरकारी कर्मचारी है तो उसकी गिरफ्तारी के लिए उसे नियुक्त करने वाले अधिकारी की सहमति जरूरी होगी। अगर सरकारी कर्मचारी नहीं है तो गिरफ्तारी के लिए एसएसपी की मंजूरी जरूरी होगी।
ऐसे मामलों में अग्रिम जमानत पर भी रोक नहीं है। कोर्ट ने कहा था कि संसद ने कानून बनाते समय यह नहीं सोचा था कि इसका दुरुपयोग होगा। निर्दोषों के मूल अधिकारों के हनन को रोकने के लिए नए साधनों का इस्तेमाल होना चाहिए। आदेश में 2015 के राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों का जिक्र भी किया गया। आंकड़ों के मुताबिक 2015 में 16 प्रतिशत मामलों में पुलिस ने जांच के बाद क्लोजर रिपोर्ट सौंप दी। साथ ही अदालतों में पहुंचे 75 प्रतिशत मामलों को या तो बंद कर दिया गया या अभियुक्त बरी हो गए या मामले वापस ले लिए गए।
दलितों का विरोध प्रदर्शन
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शीर्ष अदालत के फैसले के खिलाफ था केंद्र
केंद्र सरकार ने फैसले का विरोध करते हुए कहा था कि कोर्ट संसद में बनाए कानून के किसी प्रावधान को हटाने या बदलने का आदेश नहीं दे सकता। यही नहीं, आदेश को लेकर दलित संगठनों और नेताओं में भी नाराजगी थी। इसके खिलाफ 2 अप्रैल को बुलाए भारत बंद के दौरान कई शहरों में हुए उग्र प्रदर्शनों में 12 लोगों की जान गई थी। राजग में सहयोगी दल लोजपा के प्रमुख रामविलास पासवान और उनके बेटे चिराग पासवान ने भी मोर्चा खोल दिया था। सुप्रीम कोर्ट का फैसला देने वाले जस्टिस आदर्श गोयल को एनजीटी अध्यक्ष बनाने पर भी सवाल उठाया जा रहा था। अब फैसले के खिलाफ 9 अगस्त को भी भारत बंद का आह्वान किया गया है।
एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) संशोधित बिल, 2018
- शिकायत मिलते ही पुलिस एफआईआर दर्ज करे।
- एफआईआर दर्ज करने से पहले जांच जरूरी नहीं।
- गिरफ्तारी से पहले किसी की इजाजत लेना जरूरी नहीं है।
- केस दर्ज होने के बाद अग्रिम जमानत का प्रावधान नहीं होगा।
संशोधन से क्या होगा
संशोधन बिल के जरिये धारा-438 के प्रावधान निष्क्रिय हो जाएंगे। इस धारा के तहत जांच कराने के बाद ही गिरफ्तारी हो सकती है। इसके तहत अग्रिम जमानत का प्रावधान है। संशोधन के बाद यह धारा समाप्त हो जाएगी। संशोधन के बाद अधिनियम का अनुच्छेद 18 बदलकर 18ए हो जाएगा। इससे कानून के प्रावधान सख्त हो जाएंगे। एफआईआर दर्ज कराने से पहले प्राथमिक जांच की जरूरत खत्म हो जाएगी।