शुक्रवार को जामा-मस्जिद पर हुए प्रदर्शन के दौरान प्रदर्शनकारियों के हाथों में तरह-तरह के प्लेकार्ड्स लहरा रहे थे। अगर इन प्लेकार्ड्स की भाषा को समझें तो उनके दिल का दर्द समझ आ जाता है। सबसे ज्यादा संख्या में 'नो एनआरसी' और 'नो कैब' के प्लेकार्ड्स लहरा रहे थे। लोगों के हाथों में 'रोटी दो - रोजगार दो, धर्म की दीवार न दो' के प्लेकार्ड्स बता रहे थे कि उनके लिए रोजगार पहली प्राथमिकता है, जबकि (उन्हें लग रहा है कि) उन्हें धर्म के आधार पर बांटा जा रहा है।
अपने हाथों में 'हिंदू-मुस्लिम राजी, क्या करेगा काजी' के प्लेकार्ड्स थामे रिजवान का कहना था कि इन जामा-मस्जिद की गलियों में वे अपने हिंदू दोस्तों के साथ बचपन से खेलते आए हैं। आज तक कभी उन्हें खुद के मुस्लिम होने और दोस्त के हिंदू होने का अहसास नहीं हुआ। लेकिन आज इस नागरिकता संशोधन कानून के आने के बाद उन्हें लग रहा है कि उनके साथ धार्मिक आधार पर भेदभाव हो रहा है।
प्रदर्शनकारियों ने नागरिकता कानून को काला कानून की संज्ञा देने वाले प्लेकार्ड्स हाथ में संभाल रखे थे। उनका कहना था कि यह कानून लोगों को बांटने वाला है और अगर ऐसा ही हुआ तो आने वाले समय में पड़ोसी-पड़ोसी से बंट जाएगा। इससे समाज में बिखराव पैदा होगा। जबकि रोजगार हो या व्यापार, हिंदू-मुस्लिम सभी मिलकर करते हैं। ऐसे में लोगों को बांटना नहीं चाहिए।
जामा मस्जिद से लेकर जंतर-मंतर तक जहां भी प्रदर्शन हो रहा था, प्रदर्शनकारियों के हाथों में तिरंगा लहरा रहा था। इस तिरंगे के जरिए प्रदर्शनकारी यह संदेश दे रहे थे कि वे हिंदुस्तान के साथ हैं लेकिन वे एनआरसी और नागरिकता कानून का विरोध करते हैं। तिरंगा थामे मुजील अहमद ने कहा कि यह देश हमारे पूर्वजों का रहा है। वे जामा मस्जिद के साथ ही एक दुकान चलाते हैं। उनकी दुकान के सामान को देने वाला हो या उनका ग्राहक, हिंदू-मुस्लिम सभी होते हैं।
ऐसे में किसी सरकार को यह हक नहीं कि वह लोगों को धार्मिक आधार पर बांटे। उन्होंने कहा कि वे सरकार के इस बिल को नहीं मानेंगे क्योंकि यह धार्मिक आधार पर लोगों में नफरत पैदा करने वाला है।