गलवां नदी घाटी में 15 जून को पेट्रोलिंग प्वाइंट 14 पर भारत-चीन सैनिकों की 8 घंटे की हिंसक झड़प के 7 दिन बाद अच्छी खबर आई है। भारतीय सेना ने कहा है कि चीन और भारत के बीच में तनाव कम करने पर सहमति बनी है।
चीन ने लद्दाख के कई इलाकों में घुसपैठ की है। उसने डेपसांग में भी दावा ठोका है। गलवां नदी घाटी क्षेत्र को भी अपना बता दिया था। पैगांग त्सो झील क्षेत्र की आठ किमी की लंबाई में उसने मई 2020 से अबतक सैन्य संरचना, बंकर आदि बना लिए हैं।
डोकलाम के 73 दिन के भारत-चीन सैनिकों की तानातनी याद कीजिए। चीन की सेना 200 मीटर पीछे हटी और फिर 100 मीटर आगे आ गई। सामरिक रणनीतिकारों का कहना है कि चीन 1962 से इसी तरह की रणनीति पर चला है।
उसकी चाल पूरी सतरंजी घोड़े जैसी है। चीन रणनीतिक रूप से पहले थोड़ा फौज को पीछे ले जाने पर सहमति जताता है और बाद में अवसर देखकर धीर-धीरे आगे बढ़कर सहमति और समझौते को तोड़ देता है।
भारतीय सेना से 2019 में सेवानिवृत्त हुए सैन्य अधिकारी के अनुसार पैगांग में चीन ने काफी मजबूत उपस्थिति दर्ज कर ली है। वहां से वह पीछे नहीं हटना चाहता। लेकिन फिर भी उम्मीद पर दुनिया कायम है।
हालांकि पूर्व सैन्य अफसर का कहना है कि भारतीय सैन्य अधिकारी बहुत अच्छी रणनीति के साथ काम कर रहे हैं। इसके आगे चीन का झुकना उसकी मजबूरी बन सकती है।
सूत्र का कहना है कि चीन की सेना का पीछे हटना प्रक्रिया के तहत समय ले सकता है, क्योंकि वह भारतीय क्षेत्र में तोप, भारी वाहन समेत काफी बड़ा लाव लस्कर लेकर घुस आए हैं।
रक्षा और विदेश मामलों के वरिष्ठ पत्रकार रंजीत कुमार भी 15 जून को दोनों देशों के सैनिकों की हिंसक झड़प और उसके बाद की स्थिति को काफी गंभीर मानते हैं। पूर्व विदेश सचिव निरुपमा राव इस घटना के बाद रिश्ते के 60-70 के दशक में पहुंच जाने की संज्ञा देती हैं।
एक अन्य पूर्व विदेश सचिव शशांक का भी मानना है कि कहीं न कहीं भारतीय पक्ष से चूक हुई है। चीन ने उसका बड़ा फायदा उठाया, धोखा देने में सफल रहा। लेकिन इस बार जो उसने किया है, उससे भरोसा खोया है।
वायुसेना के पूर्व एयर वाइस मार्शल एनबी सिंह का कहना है कि कमांडिंग आफिसर सहित 20 भारतीय सैनिकों की शहादत कोई मामूली बात नहीं है। अब यह जख्म तो हमेशा याद रहेगा।
विदेश सचिव एस जयशंकर ने भी अपने समकक्ष वांग यी से 17 जून को हुई बातचीत में भी 15 जून की घटना को दोनों देशों के द्विपक्षीय रिश्ते पर बड़ा असर डालने वाला बताया था।
पूर्व वायुसेनाध्यक्ष एयरचीफ मार्शल पीवी नाइक कहते हैं भारत-चीन सीमा पर हमेशा सतर्क रहने की जरूरत है। पूर्व एयर वाइस मार्शल एनबी सिंह का कहना है कि इससे निश्चित रूप से भारत ने सबक लिया है।
इसलिए अब वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएएसी) पर स्थायी तौर पर सुरक्षा, निगरानी तथा सैन्य संरचना के उपाय करने होंगे। एनबी सिंह ने केन्द्र सरकार के सीमा पर अवसंरचना विकास के कदम को सही बताया और कहा कि इसमें तेजी लाने की जरूरत है।
मेजर जनरल (पूर्व) लखविंदर सिंह का कहना है कि वास्तविक नियंत्रण रेखा के पास चुनौतियों को ध्यान में रखकर इफैंट्री, आर्टिलरी समेत अन्य तैयारियों को दुरुस्त करना होगा।
नियमित निगरानी के उपकरणों आदि पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है, क्योंकि इस घटना से साफ है कि चीन की मंशा ठीक नहीं है।
एनबी सिंह कहते हैं कि पिछले दो दशकों से चीन की घुसपैठ बढ़ी है। पिछले पांच-छह सालों से घुसपैठ में आक्रमता के लक्षण देखने को मिले, लेकिन 2017 में डोकलाम में भूटान सीमा तक चीन की फौज के आने के बाद से घुसपैठ टकराव का रूप ले रही है।
पिछले एक महीने के भीतर भारत और चीन की फौज के बीच तीन बार (पांच मई को लद्दाख, 9 मई को नाकु ला, 15 जून को पेट्रोलिंग प्वाइंट 14) पर हिंसक झड़प हो चुकी है।