भारत हर लिहाज से 1962 से आगे निकल चुका है। चाहे वो वित्तीय स्थिति हो या फिर सामरिक स्थिति हो, भारत काफी बेहतर स्थिति में पहुंच चुका है। 1962 की धमकी चीन बार-बार देता है, लेकिन उसे समझना होगा कि ये 55 साल पुरानी बात है। चीन को भी थोडा याद रखना चाहिए।
1962 के बाद 1967 में नाथुला पास में भारत और चीन के बीच झडप हुई थी, तब भारत ने चीन को मुंहतोड जवाब दिया था। इसके बाद 1987 में सुंदरम चु के अंदर, चीनी सिपाही भारत के इलाके में घुसने की कोशिश की थी, तो भारत के तत्कालीन सेना अध्यक्ष जनरल सुंदरजी ने तत्काल कार्रवाई करके चीन को ऐसे पेच में डाल दिया था कि उनके सैनिकों को चुपके से जाना पडा था।
इसके अलावा चीन को ये भी याद रखना चाहिए था कि चीन ने जब 1979 में वियतनाम को सबक सिखाने की कोशिश की थी तब उसे खुद सबक सीखना पडा था। इसलिए चीन को फालतू और बचपने की धमकियां नहीं देनी चाहिए।
1962 में भारतीय के राजनीतिक नेतृत्व ने सैन्य अभियान का मामला अपने हाथ में ले लिया था, कई जनरलों ने अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाई थी, इसलिए भारत को हार का सामना करना पडा था। 1962 युद्ध के बारे में जितनी किताबें सामने आ रही हैं, उन सब से जाहिर होता है कि सेना ने सारी जिम्मेदारी प्रधानमंत्री नेहरू और उनके रक्षा मंत्री कृष्णन मेनन पर छोड़ दिया था।
बीते 55 साल में भारतीय सेना ने काफी गहराई से अपनी तैयारी की है
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उस वक्त भारतीय सेना को तैयारी करने का कोई मौका नहीं मिला था। ना तो भारतीय सेना के पास कपडे थे और ना ही हथियार थे। ना ही बर्फीले मौसम से तालमेल बैठाने की ट्रेनिंग थी। इन सबके बीच में नेहरू और मेनन का भरोसा इस बात में ज्यादा था कि वे इसका राजनीतिक तरीके से मामले का हल निकाल लेंगे। संयुक्त राष्ट्र में भाषण पिलाकर चीन को पीछे हटने पर मजबूर कर देंगे। ऐसा कुछ नहीं हो पाया था। पर अब वो बात नहीं रही।
बीते 55 साल में भारतीय सेना ने काफी गहराई से अपनी तैयारी की है। हर किस्म की तैयारियां हुई हैं। हमारे मोर्चे बहुत अच्छी से तैयार हैं। हमारी सेना के पास एयर फोर्स की पावर मौजूद है। 1962 में हमने अपनी वायुसेना का इस्तेमाल नहीं किया था। हमारे पास ये सब ताकत जुड़ गई हैं। हम चीन का ना केवल मुकाबला कर सकते हैं, बल्कि हम उनको रोक सकते हैं। हां, हम चीन पर पूरा कब्जा नहीं कर सकते, लेकिन उनका मुकाबला कर सकते हैं।
ये बात जरूर है कि चीन एक आर्थिक और सामरिक ताकत है, इस लिहाज से वो भारत से बेहतर स्थिति में है। आण्विक क्षमता में भी चीन भारत से बेहतर स्थिति में है। लेकिन जिस क्षेत्र में मौजूदा समय में तनाव चल रहा है वहां चीन बहुत मजबूत स्थिति में नहीं है। इसकी बुनियादी वजहें हैं।
पहली वजह तो यही है कि चीनी सेना की लॉजिस्टिक लाइन अप (रसद सामाग्री पहुंचाने और सहायता पहुंचाने की लाइन अप) को काफी पीछे से आना पड़ता है। इसके अलावा पहाड़ों पर डिफेंड करने वाली सेना को उखाड़ने के लिए कम से कम दस गुना ताकत लगानी पड़ती है। भारत मौजूदा समय में तनाव वाले इलाके में डिफेंडर की भूमिका में है। भारत का ऐसा कोई इरादा नहीं है, जैसा चीन का है।
'हमारे कमांडर वैसे नहीं हैं, जैसे 1962 में थे'
जमीन हड़पने की नीति पर भारत काम नहीं कर रहा है। चाहे वो भारत चीन की सीमा हो या फिर साउथ चाइना सी हो। ऐसे चीनी सैनिकों को बहुत दम लगाना पड़ेगा। चीन को इतना दम लगाने से पहले कई बार सोचना होगा। इसकी तीसरी वजह भी है, चीन 14 देशों से घिरा हुआ है।
ऐसे में अगर चीन भारत के साथ लडाई का माहौल बनाएगा उस वक्त चीन के बाकी दुश्मन चुप रहेंगे, ये चीन सोच भी नहीं सकता। कम से कम जापान और वियतनाम तो इस मामले में चुप नहीं बैठेंगे। कुछ और देश जो भारत के साथ रिश्ता रखते हैं वो चीन के ऊपर ही दबाव डालेंगे। ऐसे में चीन को ख्वाब देखना छोड़ देना चाहिए।
मौजूदा स्थिति में एक और बात 1962 से अलग है। इस समय भारतीय सेना का मनोबल काफी बढ़ा हुआ है। हमारे कमांडर वैसे नहीं हैं, जैसे 1962 में थे। उस वक्त जनरल कौल हुआ करते थे, कोर कमांडर थे, उन्होंने कभी किसी ट्रूप को कमांड नहीं किया था, उनकी एक ही खासियत थी कि वे नेहरू के करीबी थे। ऐसे स्थिति इन दिनों नहीं हैं। कमांडर अच्छे हैं, हथियार अच्छे हैं। सैनिकों की काफी ट्रेनिंग हुई है। आर्टेलरी, मिसाइल, एयर फोर्स सबमें इतनी ताकत है जिससे हम अपनी जमीन और सीमा के इलाके की सुरक्षा बेहतर तरीके से कर सकते हैं।
हमारा इरादा चीन पर कब्जा करने का नहीं है, लेकिन चीन अगर हमारी सीमा में घुसने की कोशिश करेगा तो उसका बुरा हश्र होगा। ऐसे में अरूण जेटली ने जो कहा है, उससे ज्यादा उन्हें कुछ कहने की जरूरत नहीं है। उन्हें अपने कमांडरों और थल सेनाध्यक्ष पर मामला छोड़ देना चाहिए जो इस हालात से निपटने में पूरी तरह सक्षम हैं।