दक्षिण एशिया के तीन देश- पाकिस्तान, श्रीलंका और मालदीव पर चीन के बेशुमार कर्ज हैं। पिछले साल तो श्रीलंका को एक अरब डॉलर से ज्यादा कर्ज के कारण चीन को हम्बनटोटा पोर्ट ही सौंपना पड़ गया था। इसके साथ ही पाकिस्तान भी चीनी कर्ज में उलझा हुआ है और एक बार फिर से आर्थिक संकट के बीच वो चीन की शरण में जा सकता है। मालदीव में भी चीन कई परियोजनाओं का विकास कर रहा है। मालदीव में जिन प्रोजक्टों पर भारत काम कर रहा था उसे भी चीन को सौंप दिया गया है।
मालदीव ने भारतीय कंपनी जीएमआर से 511 अरब डॉलर की लागत से विकसित होने वाले अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे की डील को रद्द कर दिया था। एक रिपोर्ट के अनुसार चाइना कंस्ट्रक्शन बैंक की तरफ दिए जाने वाले विदेशी कर्जों में 31 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है, जबकि इसकी तुलना में देश में यह वृद्धि दर 1.5 फीसदी ही है।
2016 की तुलना में 2017 में बैंक ऑफ चाइना की ओर से बाहरी मुल्कों को कर्ज देने की दर 10.6 फीसदी बढ़ी थी। 2013 में चीन की कमान शी जिनपिंग के हाथों में आने के बाद से ही उनकी महत्वाकांक्षी योजना वन बेल्ट वन रोड परियोजना में और तेजी आई है।
यह तीन खरब अमरीकी डॉलर से ज्यादा की लागत वाली परियोजना है। इसके तहत आधारभूत ढांचा विकसित किया जाना है। इसके जरिए चीन सेंट्रल एशिया, दक्षिणी-पूर्वी एशिया और मध्य-पूर्व में अपना दबदबा बढ़ाना चाहता है। इस परियोजना के साथ कई देश हैं, लेकिन ज्यादातर पैसे चीन समर्थित विकास बैंक और वहां के सरकारी बैंकों से आ रहे हैं।
चीन एशियाई देशों में ही नहीं बल्कि अफ्रीकी देशों में भी आधारभूत ढांचा विकसित करने के काम में लगा है। उन्हीं देशों में एक देश है जिबुती। जिबुती में अमरीका का सैन्य ठिकाना है। चीन की एक कंपनी को जिबुती ने एक अहम पोर्ट दिया है जिससे अमरीका नाखुश है।
पिछले साल 6 मार्च को अमरीका के तत्कालीन विदेश मंत्री रेक्स टिलर्सन ने कहा था कि चीन कई देशों को अपने ऊपर निर्भर बनने के लिए प्रोत्साहित कर रहा है। वो जिन अनुबंधों को हासिल कर रहा है वो पूरी तरह से अपारदर्शी हैं। नियम और शर्तों को लेकर स्पष्टता नहीं है।
बेहिसाब कर्ज दिए जा रहे हैं और इससे गलत कामों को बढ़ावा मिलेगा। उन देशों की आत्मनिर्भता तो खत्म होगी है साथ में संप्रभुता पर भी असर पड़ेगा। चीन में क्षमता है कि वो आधारभूत ढांचों का विकास करे, लेकिन वो इसके नाम पर कर्ज के बोझ को बढ़ाने का काम कर रहा है।
द सेंटर फोर ग्लोबल डिवेलपमेंट का कहना है कि वन बेल्ट वन रोड में भागीदार बनने वाले आठ देश चीनी कर्ज के बोझ से दबे हुए हैं। ये देश हैं- जिबुती, किर्गिस्तान, लाओस, मालदीव, मंगोलिया, मोन्टेनेग्रो, पाकिस्तान और तजाकिस्तान। शोधकर्ताओं का कहना है कि इन देशों ने यह अनुमान तक नहीं लगाया कि कर्ज से उनकी प्रगति किस हद तक प्रभावित होगी। कर्ज नहीं चुकाने की स्थिति में ही कर्ज लेने वाले देशों को पूरा प्रोजेक्ट उस देश के हवाले करना पड़ता है।
कई विशेषज्ञों का मानना है कि नेपाल भी चीन की मदद चाहता है, लेकिन उसके मन में एक किस्म का डर रहता है कि कहीं वो भी श्रीलंका और पाकिस्तान की तरह चीनी कर्ज के बोझ तले दब न जाए। चाइना-लाओस रेलवे परियोजना को वन बेल्ट न रोड के तहत शुरू किया गया है। इस परियोजना की पूरी लागत 6 अरब डॉलर है यानी यह लाओस की जीडीपी का आधा है। कई लोगों का कहना है कि पाकिस्तान का ग्वादर पोर्ट भी इसी राह पर बढ़ रहा है। चीन पाकिस्तान में 55 अरब डॉलर अलग-अलग परियोजनाओं में खर्च कर रहा है।
पाकिस्तान के बारे में कहा जा रहा है कि दबाव के बावजूद इस प्रोजेक्ट के अनुबंधों को सार्वजनिक नहीं किया गया है। विश्लेषकों का मानना है कि इस रकम का बड़ा हिस्सा कर्ज के तौर पर है। साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट की एक रिपोर्ट के मुताबिक पाकिस्तान में ग्वादर और चीन के समझौते को लेकर कहा जा रहा है कि पाकिस्तान चीन का आर्थिक उपनिवेश बन रहा है।
ग्वादर में पैसे के निवेश की साझेदारी और उस पर नियंत्रण को लेकर 40 सालों का समझौता है। चीन का इसके राजस्व पर 91 फीसदी अधिकार होगा और ग्वादर अथॉरिटी पोर्ट को महज 9 फीसदी मिलेगा। जाहिर है अप्रत्यक्ष रूप से पाकिस्तान के पास 40 सालों तक ग्वादर पर नियंत्रण नहीं रहेगा।
पाकिस्तान
द सेंटर फोर ग्लोबल डिवेलपमेंट की रिपोर्ट के अनुसार चीनी कर्ज का सबसे ज्यादा खतरा पाकिस्तान पर है। चीन का पाकिस्तान में वर्तमान परियोजना 62 अरब डॉलर का है और चीन का इसमें 80 फीसदी हिस्सा है। चीन ने पाकिस्तान को उच्च ब्याज दर पर कर्ज दिया है। इससे डर को और बल मिलता है कि पाकिस्तान पर आने वाले वक्त में चीनी कर्ज का बोझ और बढ़ेगा।
जिबुती
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने कहा है कि जिबुती जिस तरह से कर्ज ले रहा है वो उसके लिए ही खतरनाक है। महज दो सालों में ही लोगों पर बाहरी कर्ज उसकी जीडीपी का 50 फीसदी से 80 फीसदी हो गया। इस मामले में दुनिया के कम आय वाले देशों में जिबुती पहला देश बन गया है। इसमें से ज्यादातर कर्ज चीन के एक्जिम बैंक के हैं।
मालदीव
मालदीव के सभी बड़े प्रोजेक्टों चीन व्यापक रूप से शामिल है। चीन मालदीव में 830 करोड़ डॉलर की लागत से एक एयरपोर्ट बना रहा है। एयरपोर्ट के पास ही एक पुल बना रहा है जिसकी लागत 400 करोड़ डॉलर है। विश्व बैंक और आईएमएफ का कहना है कि मालदीव बुरी तरह से चीनी कर्ज में फंसता दिख रहा है। मालदीव की घरेलू राजनीति में टकराव है और वर्तमान में मालदीव की सत्ता जिसके हाथ में है उसे चीन का विश्वास हासिल है।
लाओस
दक्षिण-पूर्वी एशिया में लाओस गरीब मुल्कों में से एक है। लाओस में चीन वन बेल्ट वन रोड के तहत रेलवे परियोजना पर काम कर रहा है। इसकी लागत 6.7 अरब डॉलर है जो कि लाओस की जीडीपी का आधा है आईएमएफ ने लाओस को भी चेतावनी दी है कि वो जिस रास्ते पर है उसमें अंतरराष्ट्रीय कर्ज हासिल करने की योग्यता खो देगा।
मंगोलिया
मंगोलिया के भविष्य की अर्थव्यवस्था कैसी होगी ये आधारभूत ढांचा के विकास में हुए बड़े निवेशों पर निर्भर करता है। चीन के एग्जिम बैंक 2017 की शुरुआत में एक अरब अमरीकी डॉलर का फंड देने के लिए तैयार हुआ था। चीन ने इसकी शर्त हाइड्रोपावर और हाइवे प्रोजेक्ट में हिस्सेदारी रखी थी। कहा जा रहा है कि वन बेल्ट वन रोड के तहत चीन अगले पांच सालों में मंगोलिया में 30 अरब डॉलर का निवेश करेगा। अगर ऐसा होता है तो मंगोलिया के लिए इस कर्ज से बाहर निकलना आसान नहीं होगा।
मोन्टेनेग्रो
विश्व बैंक का अनुमान है कि 2018 में यहां के लोगों पर कर्ज उसकी जीडीपी का 83 फीसदी पहुंच गया। मोन्टेनेग्रो की भी समस्या उसके बड़े प्रोजेक्ट हैं। ये प्रोजेक्ट हैं पोर्ट विकसित करना और ट्रांसपोर्ट नेटवर्क को बढ़ाना। इन परियोजनाओं के लिए 2014 में चीन के एग्जिम बैंक से एक समझौता हुआ था, जिसमें पहले चरण की लागत एक अरब डॉलर में 85 फीसदी रकम चीन देगा।
तजाकिस्तान
तजाकिस्तान की गिनती एशिया के सबसे गरीब देशों में होती है। आईएमएफ चेतावनी दे चुका है कि वो कर्ज के बोझ तले दबा हुआ है। तजाकिस्तान पर सबसे ज्यादा कर्ज चीन का है। 2007 से 2016 के बीच तजाकिस्तान पर कुल विदेशी कर्ज में चीन का हिस्सा 80 फीसदी था।
किर्गिस्तान
किर्गिस्तान भी चीन के वन बेल्ट वन रोड परियोजना में शामिल है। किर्गिस्तान की विकास परियोजनाओं में चीन का एकतरफा निवेश है। 2016 में चीन ने 1.5 अरब डॉलर निवेश किया था। किर्गिस्तान पर कुल विदेशी कर्ज में चीन का 40 फीसदी हिस्सा है।