फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

भारत की इस नीति के आगे घुटने टेकने को मजबूर हो जाता है चीन

Thu, 04 Jun 2020 08:17 PM IST
Harendra Chaudhary शशिधर पाठक, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

  • विस्तारवादी नीति से कोसों दूर रहता है भारत
  • पडोसियों के साथ विश्वसनीय और सहयोग का रिश्ता है आधार
  • अंतरराष्ट्रीय सीमा, वास्तविक नियंत्रण रेखा का करता है पूरा सम्मान
  • चीन की हेकड़ी के आगे संयम का परिचय देता आया है भारत
विज्ञापन
india china disputes(file photo) - फोटो : पीटीआई
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

भारत और चीन में नीतिगत मामलों को लेकर एक बड़ा फर्क है। इसी फर्क के कारण चीन के सुरक्षा बल एलएसी में घुसपैठ जैसा आक्रामक कदम तो उठाते हैं, लेकिन हर बार घुटने टेक कर पीछे हटने पर मजबूर हो जाते हैं।
विज्ञापन


यूपीए सरकार और प्रधानमंत्री मनोमहन सिंह के समय में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार सचिवालय में रहे सूत्र का कहना है कि विदेश नीति और पड़ोसियों के साथ रिश्तों की आधारशिला देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने रखी थी।

भारत ने इस फाउंडेशन को अभी तक हिलने नहीं दिया। यही वजह है कि चीन जैसा देश भारत के साथ अपनी विस्तारवादी नीति में बार-बार फेल हो जाता है।

सूत्र का कहना है कि भारत दुनिया के कुछ चुनिंदा देशों में है। भारत अंतरराष्ट्रीय सीमा, चीन के साथ वास्तविक नियंत्रण रेखा और पाकिस्तान के साथ नियंत्रण रेखा का पूरी तरह से सम्मान करता है।
विज्ञापन


बांग्लादेश, भूटान, नेपाल, म्यांमार और श्रीलंका के साथ भारत का रिश्ता सहयोग, विश्वसनीयता का है। नाम न छापने की शर्त पर सूत्र ने कहा कि देश ने कभी पड़ोसियों की अहमियत को नजरअंदाज नहीं किया।

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने भी पंडित नेहरू की नीतियों को ही आगे बढ़ाया। यहां तक कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पड़ोसी पहले की नीति भी इसी का हिस्सा है।

प्रधानमंत्री मोदी ने दिया नया आधार

सूत्र का कहना है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भारतीय विदेश नीति में कोई छेड़छाड़ नहीं की है। उन्होंने इसे भारत के राष्ट्रीय हित में नया आधार दिया है।

चीन की सीमा पर मोदी सरकार के समय में भारतीय सुरक्षा बलों की गश्त पहले से ज्यादा प्रभावी तरीके से हो रही है।

सीमा क्षेत्र में सामरिक उद्देश्य को केंद्र में रखकर संसाधनों के विकास को लेकर भी तेजी से काम हो रहा है। भारत ने उत्तराखंड में चीन से लगती सीमा तक सड़क विस्तार करने के साथ-साथ लेह, लद्दाख, सिक्किम, अरुणाचल तक पहुंच को आसान बनाया है।

प्रधानमंत्री मोदी ने विश्वास बहाली के उपाय पर भी जोर दिया। शी जिनपिंग के साथ अनौपचारिक बातचीत की शुरुआत इसी का हिस्सा है।

भारत ने चीन के सुरक्षा बलों की घुसपैठ पर कभी भी आक्रामक रवैया नहीं अपनाया। सैन्य विकल्प नहीं अजमाए। हमेशा बातचीत से समस्या के हल का प्रयास किया।

खास बात यह है कि भारत ने ऐसा कोई विकास कार्य किसी भी विवादित क्षेत्र में नहीं किया है। इसलिए चीन इससे चिढ़ सकता है, लेकिन आधिकारिक रूप से इसका कोई विरोध नहीं कर सकता।

चीन का रिकार्ड खराब है

वरिष्ठ सूत्र का कहना है कि इस पूरे मामले में चीन का रिकार्ड खराब है। उसके सैनिक, सुरक्षा बल पिछले कई दशक से भारत की सीमा में आकर सिगरेट के डिब्बे, माचिस, रुमाल या झंडे छोड़ जाते थे।

ताकि भारतीय सुरक्षा बलों को उनके आने की सूचना मिल सके। बाद के वर्षों में चीन के सुरक्षा बल भारतीय क्षेत्र में घुसपैठ करके रुकने लगे और विरोध जताने पर चले जाते थे।

कभी यदि भारतीय सुरक्षा बल चीन के क्षेत्र में गए, तो चीन ने उस पर हमेशा आक्रामक तरीके से एतराज जताया।

यहां तक कि अरुणाचल में प्रधानमंत्री या दलाई लामा के जाने पर भी वह आपत्ति जताता रहा है। बताते हैं पिछले कुछ सालों से चीन के सुरक्षा बल आक्रामक तरीके से न केवल घुसपैठ कर रहे हैं, बल्कि अड़ जाते हैं।

अब वह भारतीय सुरक्षा बलों के साथ टैक्टिकल मूव अपनाते हुए हिंसक झड़प भी कर रहे हैं। चीन इसी तरह का प्रयास दक्षिण चीन सागर में कर रहा है।

उसका वियतनाम, ताइवान या फिर जापान से निबटने का तरीका भी कुछ ऐसा ही है। चीन की नीति या तो विस्तारवाद की है, या फिर कर्ज नीति में उलझाने और प्रभाव बढ़ाने की रहती है।
विज्ञापन
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें