सुप्रीम कोर्ट ने वैवाहिक विवादों को जल्द सुलझाने पर जोर देते हुए कहा, ऐसे मामलों में देरी होने का सबसे ज्यादा प्रभाव बच्चों पर पड़ता है क्योंकि वे माता पिता के प्यार व स्नेह से वंचित रहते हैं। बच्चों की कस्टडी को लेकर लड़ाई में भले ही माता या पिता में से किसी की जीत हो, लेकिन बच्चों की हमेशा हार होती है। कोर्ट ने कहा कि प्रयास होना चाहिए कि ऐसे विवादों का निपटारा मध्यस्थता के जरिए हो।
जस्टिस एएम खानविलकर और जस्टिस अजय रस्तोगी की पीठ ने मंगलवार को कहा है कि माता-पिता के झगड़े की बच्चों को सबसे अधिक कीमत चुकानी पड़ती है। बच्चों का जीवन तब बिखर जाता है जब अदालत न्यायिक प्रक्रिया के जरिए बच्चों को माता-पिता में से किसी एक के साथ रहने का विकल्प देती है, जिनके साथ रहना वह उचित समझता हो।
पीठ ने कहा कि प्रयास यह होनी चाहिए कि वैवाहिक विवाद का निपटारा मध्यस्थता के जरिए हो और मध्यस्थता प्रक्रिया विफल हो जाए तो न्यायिक प्रक्रिया के जरिए पति-पत्नी के बीच के झगड़े का निपटारा जल्द से जल्द करना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने ये बातें दिल्ली निवासी पति पत्नी की तलाक की कार्यवाही और बच्चों की कस्टडी देने के मामले में कही।
पीठ ने कहा कि मामले में शीर्ष अदालत को पति-पत्नी की हठधर्मिता व बच्चों को नैनीताल के बोर्डिंग स्कूल में भेजने को लेकर अवमानना की कार्यवाही शुरू करनी चाहिए थी। सितंबर, 2017 के आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने दंपती के दोनों बच्चों को दशहरा, दिवाली और शीत अवकाश माता या पिता के साथ बिताने को लेकर विस्तृत आदेश पारित किया था।
मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए फैसले में उस अंतरिम व्यवस्था को बढ़ाने का निर्देश दिया है और पति व पत्नी को बच्चों की कस्टडी और संरक्षण का जल्द समाधान निकालने को कहा गया था।