छत्तीसगढ़ में मंगलवार को पहले चरण का मतदान संपन्न हो गया। नक्सल प्रभावित इलाकों के वोटरों में खासा उत्साह देखा गया। तेलंगाना और छत्तीसगढ़ की सरहद पर स्थित बीजापुर जिले का गांव 'पामेड़', जो अतिसंवेदनशील गांवों की सूची में शामिल रहा है, वहां पर लोगों ने खूब मतदान किया। इसकी वजह वहां पर सीआरपीएफ द्वारा स्थापित फॉरवर्ड आपरेटिंग बेस (एफओबी) है। दो साल पहले स्थापित हुए इस एफओबी ने नक्सल प्रभावित गांव की तस्वीर बदल दी है। इस गांव ने नक्सलियों द्वारा बांटे गए पर्चे और धमकी की परवाह नहीं की। सीआरपीएफ की 151वीं बटालियन के पहरे में जमकर मतदान किया। पहली बार इस गांव में करीब 56 फीसदी वोटिंग हुई है। ग्रामीणों ने सीआरपीएफ का आभार जताया है।
छत्तीसगढ़ में मंगलवार को पहले चरण का मतदान संपन्न हो गया। नक्सल प्रभावित इलाकों के वोटरों में खासा उत्साह देखा गया। तेलंगाना और छत्तीसगढ़ की सरहद पर स्थित बीजापुर जिले का गांव 'पामेड़', जो अतिसंवेदनशील गांवों की सूची में शामिल रहा है, वहां पर लोगों ने खूब मतदान किया। इसकी वजह वहां पर सीआरपीएफ द्वारा स्थापित फॉरवर्ड आपरेटिंग बेस (एफओबी) है। दो साल पहले स्थापित हुए इस एफओबी ने नक्सल प्रभावित गांव की तस्वीर बदल दी है। इस गांव ने नक्सलियों द्वारा बांटे गए पर्चे और धमकी की परवाह नहीं की। सीआरपीएफ की 151वीं बटालियन के पहरे में जमकर मतदान किया। पहली बार इस गांव में करीब 56 फीसदी वोटिंग हुई है। ग्रामीणों ने सीआरपीएफ का आभार जताया है।
दो राज्यों की सीमा पर स्थित पामेड़ गांव और उसके आसपास, माओवादियों का जबरदस्त प्रभाव रहा है। इसकी वजह से यहां का विकास नहीं हो सका। विधानसभा या लोकसभा का चुनाव होता, तो नक्सलियों की चेतावनी से डर कर लोग, वोट नहीं डालते थे। यहां पर सुरक्षा बल भी आसानी से नहीं पहुंच सकते थे। बीजापुर के सड़क मार्ग से जुड़ने वाला अप्रोच रोड तैयार करने में दशक लग गए। हालांकि पामेड़ में 1984 में पुलिस चौकी स्थापित की गई थी और 1989 में थाना भी बनाया गया, लेकिन नक्सलियों का प्रभाव कम नहीं हो सका। पहले यहां के हालात इतने खराब थे कि बाहर निकलने से पुलिस कर्मी डरते थे। एक तरफ नक्सली और दूसरी तरफ कोई ऐसा सड़क मार्ग भी नहीं था, जिसकी मदद से पुलिस कर्मी कहीं पर आवाजाही कर पाते। जिला प्रशासन, अगर सड़क निर्माण का कार्य शुरू करता तो नक्सली उसे बंद करा देते थे। मशीन व दूसरी सामग्री पर कब्जा कर लेते थे। पामेड़ को तेलंगाना से जोड़ने वाला मार्ग, जो महज 11 किलोमीटर लंबा था, उसका निर्माणकार्य सीआरपीएफ सुरक्षा में शुरु हुआ। सीआरपीएफ व लोकल पुलिस के करीब 1500 जवानों की सुरक्षा में रोड बनाने का कार्य पूरा हुआ।
दो वर्ष पहले यहां पर सीआरपीएफ की 151वीं बटालियन ने फॉरवर्ड आपरेटिंग बेस (एफओबी) स्थापित किया था। सीआरपीएफ द्वारा नक्सलियों के खिलाफ शुरु किए गए लगातार आपरेशन से नक्सलियों के पांव उखड़ने लगे। सीआरपीएफ ने नक्सलियों को पामेड़ और उसके आसपास के क्षेत्र से खदेड़ दिया। एफओबी स्थापित होने से यहां के ग्रामीणों में सुरक्षा का अटूट भरोसा पैदा हुआ। यहां पर मिर्च की पैदावार होती थी, लेकिन सड़क मार्ग न होने और नक्सलियों के प्रभाव के चलते, ग्रामीणों को उससे कोई फायदा नहीं होता था। अब सीआरपीएफ की सुरक्षा में ग्रामीणों ने मिर्च की पैदावार पर ध्यान देना शुरू कर दिया। इस बार भी नक्सलियों ने पर्चे बांटकर ग्रामीणों को मतदान में भाग न लेने की धमकी दी थी, लेकिन सीआरपीएफ ने लोगों को भरोसा दिया कि नक्सली उनके करीब नहीं आ सकते। वे खुलकर मतदान करें। इसके बाद लोगों ने खूब वोटिंग की। पोलिंग स्टाफ को अचूक सुरक्षा प्रदान की गई। पहले पामेड़ के लोग नक्सलियों की धमकी के चलते वोटिंग प्रक्रिया से दूर रहते थे, लेकिन इस बार यहां पर 56 फीसदी मतदान हुआ है। ग्रामीण युवा पारंपरिक खेती के साथ मिर्च की पैदावार को भी बढ़ा रहे हैं। सीआरपीएफ कैंप स्थापित होने से यहां के लोगों के आर्थिक उन्नयन के साथ साथ उनके सामाजिक विकास की नई परिपाटी गढ़ी जा रही है।