भारत में चीतों के पुनर्वास के लिए बनाई गई 11 सदस्यीय समिति के अध्यक्ष राजेश गोपाल ने चीतों को बड़े अनुकूलन बाड़ों में रखने के विचार को खारिज करते हुए कहा, हमने 50 साल में बाघों को संभाला है, चीतों को भी संभाल लेंगे। उन्होंने कहा, बाड़बंदी से चीतों की प्राकृतिक गतिविधियों बाधित हो सकती हैं, इसके अलावा चीतों की आबादी के बीच आनुवंशिक आदान-प्रदान को नुकसान पहुंच सकता है।
दक्षिण अफ्रीका और नामिबिया से लाए गए चीतों में तीन की मौत होने के बाद चीता पुनर्वास परियोजना को लेकर सवाल उठने लगे हैं। भारत में इस परियोजना में अहम भूमिका निभा रहे दक्षिण अफ्रीकी चीता विशेषज्ञ विंसेंट वॉनडेर मार्व का कहना है कि दक्षिण अफ्रीका में चीतों को खुले जंगल में बिना बाड़बंदी के बसाने के 15 प्रयास हुए और हर बार असफलता मिली। लिहाजा, भारत में चीतों के लिए आदर्श आवास व्यवस्था के लिए बाड़बंदी का इस्तेमाल किया जा सकता है। यह चीतों के प्रजनन के लिए बेहद अहम है।
जो अफ्रीका में हुआ, जरूरी नहीं भारत में भी हो...
राजेश गोपाल का कहना है कि जो अफ्रीका में हुआ, वह भारत में हो जरूरी नहीं है। वैसे भी बाड़बंदी करना वन्यजीव संरक्षण के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है। इसके बजाय हम संरक्षित क्षेत्रों के क्षेत्रीय नेटवर्क के विलय के बारे में सोच रहे हैं। उन्होंने कहा, हमारे अपने सामाजिक-सांस्कृतिक मुद्दे हैं। हम पिछले 50 वर्षों से बाघों को संभाल रहे हैं और जानते हैं कि मानव-वन्यजीव टकराव क्या है।
दो-तीन बाड़ बनाना जरूरी...
मार्व कहते हैं, हम इस बात की वकालत नहीं कर रहे हैं कि भारत सभी चीतों को बाड़बंदी में रखे। बस दो या तीन बाड़ लगाएं, जहां, चीतों के लिए अनुकूलतम स्थितियां दी जाएं, ताकि प्रजनन के जरिये चीतों की संख्या बढ़ाई जा सके। इसके बाद इन चीतों को खुले जंगलों में छोड़ा जा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट भी उठा चुका है सवाल...
कई वन्यजीव विशेषज्ञों के अलावा सुप्रीम कोर्ट भी कूनो राष्ट्रीय उद्यान (केएनपी) में चीतों के लिए पर्याप्त जगह और अनुकूल परिस्थितियों की कमी को लेकर सवाल खड़े कर चुका है। इसके साथ ही चीतों को कूनो के अलावा दूसरे जंगलों में भेजने की सलाह दी है। इस बीच अधिकारियों ने बताया कि मध्य प्रदेश के ही गांधी सागर अभयारण्य को चीतों के वैकल्पिक आवास के तौर पर नवंबर तक तैयार कर लिया जाएगा।
जून के आखिर में खुले जंगल में छोड़े जाएंगे सात चीते
राकेश गोपाल ने बताया कि जून के तीसरे सप्ताह में सात और चीतों को खुले जंगल में छोड़ा जाएगा। इनमें से दो मादा हैं। भारत में चीतों के पुनर्वास के लिए नामिबिया से 8 और दक्षिण अफ्रीका से 12 चीते लाए गए, जिनमें से तीन की मौत हो चुकी है। वहीं, एक मादा चीता ने चार शावकों को जन्म दिया था, जिनमें से तीन की मौत हो चुकी है।
सफल होगी चीता पुनर्वास परियोजना : भूपेंद्र यादव
तीन महीने में तीन चीतों और तीन शावकों के मरने के बाद केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने गुरुवार को कहा, जो कुछ भी हुआ उसकी हम जिम्मेदारी लेते हैं, लेकिन चीता पुन: परिचय परियोजना सफल होगी।