पशुओं में एंटीबायोटिक दवाओं के बेतरतीब इस्तेमाल पर लगाम लगाने के लिए केंद्र सरकार ने एक नया निगरानी तंत्र विकसित करने का निर्णय लिया है। इसके तहत राज्यों से नोडल अधिकारियों और पशु एंटीबायोटिक दवाएं बेचने वाली फार्मा कंपनियों की सूची मांगी गई है। साथ ही, बिना पर्ची के बिकने वाली इन दवाओं पर सख्त नियंत्रण के निर्देश दिए गए हैं।
पशुपालन और डेयरी मंत्रालय के तहत पशु स्वास्थ्य विभाग ने यह कदम एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस (एएमआर) की बढ़ती समस्या को देखते हुए उठाया है। एएमआर तब होता है जब बैक्टीरिया, वायरस या अन्य रोगाणु एंटीबायोटिक दवाओं के प्रति प्रतिरोधी हो जाते हैं, जिससे संक्रमण का इलाज मुश्किल हो जाता है। यह समस्या न सिर्फ पशुओं, बल्कि मनुष्यों के लिए भी गंभीर खतरा बन चुकी है।
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राज्यों से मांगी जानकारी
केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (सीडीएससीओ) ने राज्यों से पशु एंटीबायोटिक बनाने, बेचने और वितरित करने वाली सभी फार्मा कंपनियों की सूची मांगी है। इसके अलावा राज्यों को पशु एंटीबायोटिक दवाएं बनाने, बेचने और वितरित करने वाली कंपनियों की पूरी सूची जमा करनी होगी।
डेयरी और मांस उद्योग में दवाओं का दुरुपयोग
भारत में दूध उत्पादन बढ़ाने और पशुओं में संक्रमण रोकने के लिए एंटीबायोटिक दवाओं का अत्यधिक इस्तेमाल किया जा रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने बार-बार चेतावनी दी है कि पशुओं में एंटीबायोटिक का अंधाधुंध इस्तेमाल मानव स्वास्थ्य के लिए खतरनाक है। यदि इस पर रोक नहीं लगाई गई, तो भविष्य में सामान्य संक्रमण भी लाइलाज हो सकते हैं।
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देश में प्रति 40,000 पशुओं पर मात्र एक चिकित्सक...
भारत में पशु चिकित्सा सेवाओं की स्थिति चिंताजनक है। आंकड़ों के अनुसार, देश में प्रति 40,000 पशुओं पर मात्र एक पशु चिकित्सक उपलब्ध है। इस कमी के कारण ग्रामीण क्षेत्रों में पशुपालक बिना डॉक्टर की सलाह के ही मेडिकल स्टोर्स से एंटीबायोटिक दवाएं खरीद लेते हैं। अक्सर दुकानदार भी बिना पर्ची के इन दवाओं की बिक्री कर देते हैं। इस वजह से इन दवाओं का इस्तेमाल अंधाधुंध बढ़ गया है।