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गरीब, प्रवासी मजदूर चले गांव की ओर, सरकारों ने देना शुरू किया साथ!

Sat, 25 Apr 2020 06:56 PM IST
Harendra Chaudhary शशिधर पाठक, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

  • केंद्र सरकार की मूक सहमति ने आसान की राज्यों की मुसीबत
  • बाजी मार ले गए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ
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बांद्रा स्टेशन पर इकट्ठा हुए प्रवासी मजदूर - फोटो : PTI (File)
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विस्तार
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मध्य प्रदेश के नये मंत्री जी ने जानकारी दी कि खंडवा, भोपाल समेत तमाम जिले से उत्तर प्रदेश, बिहार के मजदूर राज्य की सीमा तक रवाना किए जा रहे हैं। महाराष्ट्र सरकार ने भी दूसरे राज्य के मजदूरों को सीमा तक पहुंचाने की तैयारी शुरू कर दी है। राजस्थान, हरियाणा, गुजरात, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना भी इस फार्मूले पर अमल कर रहे हैं।

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राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने पहल शुरू कर दी है। झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन भी गरीब, मजदूर और राज्य के दूसरे राज्यों में फंसे छात्रों को लाने के लिए सक्रिय हैं। भाजपा के कर्नाटक के विधायक ने जानकारी दी कि उनके राज्य में भी यही होगा।

दूसरे राज्यों से गरीब, मजदूर अपने जिले तक पहुंचाए जाएंगे और दूसरे राज्यों के मजदूरों को सीमा तक जाने की सहूलियत दी जाएगी।

बाजी मार ले गए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ

योगी आदित्यनाथ ने गरीब, मजदूरों को राज्य की सीमा में लाने की घोषणा करके बाजी मार ली है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने इसका एक प्रोटोकॉल भी तैयार किया है। इसके मुताबिक दूसरे राज्यों से आने वाले गरीब, मजदूरों को पहले उनके गृह जिले के क्वारंटीन केयर सेंटर में रखा जाएगा।

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14 दिन वहां रहने के बाद वह मजदूर अनाज के पैकेट के साथ अपने घर-गांव जा सकेंगे। उत्तर प्रदेश के ज्यादातर कामगार गरीब, मजदूर दिल्ली, राजस्थान, हरियाणा, पंजाब, महाराष्ट्र, गुजरात, पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में हैं।

इस तरह से प्रधानमंत्री के साथ मुख्यमंत्रियों की वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से पहले गरीब, मजदूरों के अपने घर-गांव पहुंच जाने की समस्या का समाधान होता दिखाई दे रहा है। माना जा रहा है कि इसमें केंद्र सरकार की भी मौन स्वीकृति है।

आसान नहीं है मजदूरों को बैठाकर खिलाना

केंद्र सरकार के ग्रामीण विकास मंत्रालय के एक अधिकारी की मानें, तो मजदूरों को इस तरह से बैठाकर खिलाना आसान नहीं है। सूत्रों का कहना है कि तमाम राज्यों के गरीब, मजदूर दूसरे राज्यों में काम करते हैं। उनके पास कोई पहचान पत्र या राशनकार्ड नहीं होता।

इन मजदूरों के परिवार के कुछ लोग गांव में भी रहते हैं। ऐसे में राशन कार्ड से उनके नाम पर राशन लेने के दोहराव जैसी समस्या भी खड़ी होनी स्वाभाविक है। खाद्य एवं आपूर्ति वितरण मंत्रालय के निदेशक स्तर के अधिकारी ने माना कि कई व्यवहारिक समस्याएं हैं।

मजदूरों के आने-जाने का भी चक्र है

मदन दिल्ली में हैं। रंगाई, पुताई और प्लंबर का काम आता है। मदन के भाई सीताराम हैं। सीताराम भी प्लंबर हैं। दोनों भाईयों का सारा काम साझे में चलता है। मदन बताते हैं कि छह महीना वह दिल्ली रहते हैं, मजदूरी, काम करते हैं। सीताराम अंबेडकरनगर गांव में खेती करते हैं और खेतिहर मजदूरी, दूध बेचने का काम कर लेते हैं।

छह महीने बात सीताराम दिल्ली आ जाते हैं और मदन गांव जाकर उनका काम संभाल लेते हैं। दोनों का परिवार गांव में रहता है। मदन के साथ शिवकुमार, रमेश और पन्नालाल भी एक ही कमरे में रहते हैं। पन्नालाल का काम धंधा बंद है तो वह इन दिनों सुबह गाजीपुर मंडी से सब्जी लाकर बेच रहे हैं।

इनका कहना है कि परिवार गांव में रहता है। यह सब कुछ महीने गांव में और कुछ महीने दिल्ली में रहते हैं। किराना की दुकान पर सामान ढोने वाले उन्नाव के अनंतू और एटा के सुनील का भी यही कहना है। बताते हैं सब मोटर, गाड़ी चलते ही एक बार गांव चले जाएंगे।

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