बल की जितनी भी ऑपरेशनल यूनिट हैं, वहां पर विशेष तरह का युद्धाभ्यास शुरू करने के आदेश जारी कर दिए गए हैं। इसके लिए 15 जुलाई तक रिपोर्ट देने के लिए कहा गया है। युद्धाभ्यास में कई ऐसे उपकरण भी शामिल रहेंगे, जिनका इस्तेमाल पहली बार हो रहा है। सुरक्षा कारणों से उनका खुलासा नहीं किया जा सकता। दूसरा, सभी यूनिटों को ड्रोन विंग के बारे में विशेष हिदायतें दी गई हैं। युद्धाभ्यास के अलावा आफेंसिव और डिफेंसिव ऑपरेशन में ड्रोन तकनीक का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होगा। हालांकि ऑपरेशनल क्षेत्रों में इसका इस्तेमाल किया जा रहा है, लेकिन अब नई टेक्नोलॉजी वाले ड्रोन बल में शामिल किए जाएंगे। इसके लिए सीआरपीएफ की सभी ऑपरेशनल इकाइयों को 15 जून तक का समय दिया गया है।
खासतौर पर उत्तर-पूर्व, नक्सल और कश्मीर में बल को संचार से जुड़ी कुछ दिक्कतों का सामना करना पड़ा है। सूत्रों ने बताया, अनेक जगहों पर, विशेषकर जंगलों व पहाड़ों में मोबाइल नेटवर्क उपलब्ध नहीं होता। अगर ऑपरेशनल टीम को पुलिस के साथ मिलकर आतंकियों या नक्सलियों का फोन इंटरसेप्ट करना हो तो उस दौरान मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। अब बल को ऐसी दिक्कतें नहीं झेलनी पड़ेंगी। सभी ऑपरेशनल यूनिटों से कहा गया है कि वे जमकर रिपीटर स्टेशन स्थापित करें। संचार के मायने से जितने भी डेड जोन हैं, वहां पर 15 अगस्त तक रिपीटर स्टेशन इंस्टॉल कर दिए जाएं। इससे त्वरित एवं प्रभावी संचार में मदद मिलेगी।
संचार उपकरणों की उपलब्धता और उनके अपग्रेडेशन के लिए एक कमेटी गठित की जाए। यह कमेटी तय करे कि किस उपकरण को सेवा में रखना है या नहीं। अगर कोई उपकरण ऑपरेशनल टीम के लिए मददगार साबित नहीं हो पा रहा है तो उसे हटा दें। उसकी जगह पर दूसरा उपकरण मुहैया कराया जाए। अधिकारियों की कमेटी देखेगी कि कौन सा उपकरण ऑपरेशन के दौरान कारगर साबित होगा। किस यूनिट में कितने उपकरण खरीदे जाएं, उसकी प्रक्रिया क्या रहेगी और नए उपकरणों को चलाने की ट्रेनिंग, यह सारा काम कमेटी करेगी। काम में देरी न हो, इसलिए यहां पर भी 15 जुलाई की डेड लाइन तय की गई है।
चूंकि नए संचार उपकरणों को चलाने के लिए कार्यकुशल एवं तकनीक में पारंगत जवान भी चाहिएं, इसलिए सीआरपीएफ ने केंद्रीय गृह मंत्रालय से सिग्नल यूनिट के लिए दो बटालियन खड़ी करने की स्वीकृति देने की मांग की है। इसका फायदा यह होगा कि बल को नए संचार उपकरणों को समझने एवं उनके इस्तेमाल के लिए प्राइवेट कंपनियों की ट्रेनिंग पर लंबे समय तक निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। बल के कुछ अफसरों और जवानों को जब ट्रेनिंग मिल जाएगी, तो वे दूसरे जवानों को उन उपकरणों का इस्तेमाल करना सिखा सकते हैं। ड्रोन और रिपीटर स्टेशन के अलावा संचार के जो दूसरे उपकरण स्थापित किए जाएंगे, उसके लिए कम से कम दो बटालियन खड़ी करना जरुरी है।