सर्तक नागरिक संगठन की सूचना के अधिकार कानून पर हाल में जारी रिपोर्ट कहती है कि देश में हर साल केंद्र और राज्यों में 40 से 60 लाख आरटीआई आवेदन दाखिल किए जाते हैं। आवेदनकर्ताओं में 91 फीसदी पुरुष और 9 फीसदी महिलाएं होती हैं। रिपोर्ट के मुताबिक केंद्रीय सूचना आयोग में दाखिल अपीलों और शिकायतों का फैसला आने में 319 दिन लग रहे हैं।
सर्तक नागरिक संगठन से जुड़ी और आरटीआई कार्यकर्ता अंजलि भारद्वाज का कहना है कि इसकी वजह है कि केंद्रीय सूचना आयोग में केवल 7 सूचना आयुक्त ही काम कर रहे हैं। जिसके चलते 1 जनवरी, 2018 से लेकर अक्टूबर, 2018 तक 25 हजार से ज्यादा शिकायतों और अपीलों का अंबार लगा हुआ है।
अंजलि कहती हैं कि मार्च, 2011 में सिंगल बेंच हर साल लगभग 3200 शिकायतों और अपीलों का निपटारा करती थी, लेकिन आज के वक्त में सीआईसी में जो हालात हैं, उसके चलते तीन महीनों में यह औसत गिर कर 800 से भी कम हो गया है। उनका कहना है कि एक–दो सूचना आयुक्त ही ऐसे हैं, जो तीन माह में बारह सौ से लेकर 15 सौ याचिकाओं का निपटारा करने में सक्षम हैं।
सीआईसी भी दिसंबर में रिटायर
हाल ही में कुछ आरटीआई कार्यकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर करके सूचना आयुक्तों की यथाशीघ्र नियुक्ति करने की अपील की थी। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद सरकार ने इनकी नियुक्तियों के लिए विज्ञापन जारी किया था। अंजलि यह भी कहती हैं कि हालात और बदलतर होने वाले हैं, क्योंकि सीआईसी में मुख्य सूचना आयुक्त समेत चार लोग रिटायर होने वाले हैं और मुख्य सूचना आयुक्त के रिटायर होने के बाद वहां कोई केसों का बंटवारा करने वाला नहीं होगा और प्रशासनिक समस्याएं भी पैदा होंगी। गौरतलब है कि मुख्य सूचना आयुक्त आरके माथुर इस साल दिसंबर में रिटायर होने वाले हैं।
आंकड़ों के मुताबिक आरटीआई एक्ट के सेक्शन 20 के तहत तकरीबन 56 फीसदी आवेदन ऐसे थे, जिनमें जनसूचना अधिकारियों ने नियमों का उल्लंघन किया, लेकिन मात्र 28 फीसदी मामलों में ही सूचना आयुक्तों ने कारण बताओ नोटिस जारी किया, जबकि केवल चार फीसदी मामलों में अर्थ दंड लगाया। रिपोर्ट के मुताबिक 2005 से लेकर 2016 तक मात्र सीआईसी ने 1.93 करोड़ का ही अर्थदंड लगाया।
कई राज्यों में पद खाली
केंद्रीय और राज्यों में सूचना आयुक्तों के कुल 156 पद हैं, लेकिन इसमें से 48 पद लंबे समय से खाली हैं। वहीं आंध्र प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और नागालैंड में राज्य मुख्य सूचना आयुक्त और एमपी, बिहार, मणिपुर, मेघालय, सिक्किम और त्रिपुरा में सूचना आयुक्तों के पद खाली हैं।
रिपोर्ट बताती है कि आरटीआई की सही सूचना नहीं देने वाले जनसूचना अधिकारियों पर आरटीआई एक्ट, 2005 के तहत सूचना आयुक्त 25 हजार का जुर्माना ठोक सकते हैं। लेकिन सूचना आयुक्तों की कमी के चलते जनसूचना अधिकारियों पर जुर्माना नहीं लगाया जा रहा। जिससे 203 करोड़ रुपये सालाना का नुकसान हो रहा है। रिपोर्ट बताती है कि सीआईसी के चार आयुक्तों ने तो जीरो अर्थदंड लगाया।
जुर्माना न लगने से बेखौफ हुए अफसर
सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करने वाले आरटीआई कार्यकर्ता निखिल डे का कहना है कि सूचना आयुक्तों की कमी के चलते जनसूचना अधिकारी बेखौफ हो रहे हैं। जुर्माना लगाने से अधिकारियों पर कई गंभीर प्रभाव पड़ते हैं, और इससे उन्हें कानून के उल्लंघन नहीं करने का डर पैदा होता है। लेकिन जुर्माना न लगाने से आरटीआई के आधारभूत ढांचे को ही नुकसान पहुंच रहा है।