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केंद्र सरकार ने 2015 में भेजा था एकसाथ चुनाव कराने के मद्देनजर प्रस्ताव

Sun, 15 Apr 2018 07:50 AM IST
पीयूष पांडेय, नई दिल्ली
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west bengal election
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केंद्र सरकार और नीति आयोग भले ही लोकसभा-विधानसभा चुनाव एकसाथ कराने के लिए रूपरेखा तैयार कर रहे हों पर राष्ट्रीय चुनाव आयोग के मुताबिक बिना संविधान संशोधन के यह संभव नहीं है और मौजूदा समय सरकार के पास इस संशोधन के लिए राज्यसभा में बहुमत नहीं है।  

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मुख्य चुनाव आयुक्त ओपी रावत के मुताबिक सरकार ने 2015 में केंद्र सरकार ने पूछा था कि अगर लोकसभा-विधानसभा एक साथ कराने हों तो क्या किया जाना चाहिए। चुनाव आयोग ने उसी साल जवाब दिया था कि संविधान में संशोधन करने होंगे। इसके अलावा जनप्रतिनिधित्व अधिनियम-1951 के विभिन्न प्रावधानों में बदलाव करना होगा। अगर वो कानूनी प्रारूप एकबार तैयार हो जाएगा तो फिर संचालन एवं क्रियान्वयन ईवीएम-वीवीपीएट पर्याप्त संख्या में होंए एकसाथ चुनाव होने पर यह दोगुने लगेंगे। पोलिंग पर तैनात कर्मचारी व अधिकारी चाहिए होंगे साथ ही केंद्रीय बल भी उसी के मुताबिक ज्यादा संख्या में चाहिए होगा। अगर यह सब व्यवस्था हो जाएगी तो फिर हम चुनाव करा सकेंगे लेकिन सरकार पहले एक साथ चुनाव कराने के लिए समुचित संशोधन संविधान में करे। उन्होंने स्पष्ट किया कि आयोग एक संवैधानिक निकाय है और उसके मुताबिक ही चुनाव कराने के लिए कटिबद्ध है।  

नीति ने नहीं भेजी कोई रूपरेखा
सीईसी ने कहा कि नीति आयोग द्वारा कोई रूपरबडखा इस पर तैयार की गई है, लेकिन उनकी ओर से अब तक हमें कुछ नहीं भेजा गया है। वहीं नीति आयोग ने एक रूपरेखा संसद की स्थायी समिति की 79वीं रिपोर्ट के आ धार पर तैयार की है। इसमें लोकसभा चुनाव के साथ विधानसभा चुनाव कराने के लिए समय से पहले विधानसभा चुनाव कराने के लिए समय से पहले भंग करने की संभावना के बारे में कहा गया है। आयोग की रूपरेखा के मुताबिक 2019 लोकसभा चुनाव में सिक्किम, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, ओडिसा, अरुणाचल प्रदेश के विधानसभा चुनाव लोकसभा के साथ कराने में कोई अड़चन नहीं है। 
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दरअसल इन राज्यों की सरकारों का कार्यकाल लोकसभा चुनाव के आसपास ही खत्म हो रहा है। जबकि हरियाणा और महाराष्ट्र के चुनाव पांच माह पहले कराए जा सकते हैं और झारखंड में सात माह व दिल्ली में 8 माह पहले कराने होंगे। इसके बाद मिजोरम, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और राजस्थान की विधानसभा का कार्यकाल चार से छह माह आगे तक का है जिसे घटाया जा सकता है। 

इसके बाद दूसरे चरण 2024 लोकसभा चुनाव में बिहार, मेघालय, त्रिपुरा, नागालैंड, पुडुचेरी, तमिलनाडु, असम, पश्चिम बंगाल, केरल, पंजाब, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, मणिपुर, गोवा, हिमाचल प्रदेश, गुजरात के विधानसभा चुनाव एकसाथ उनके कार्यकाल को घटा-बढ़ाकर शामिल किया जा सकता है। हालांकि नीति आयोग की रूपरेखा में कोई स्पष्टता नहीं है कि विस का कार्यकाल किस तरह से घटाया-बढ़ाया जा सकता है।  

राष्ट्रपति शासन पर टिप्पणी नहीं
राष्ट्रपति शासन लगाकर चुनाव कराने के सवाल पर सीईसी ने कहा कि इस पर टिप्पणी करने के लिए वह सक्षम नहीं है। इस पर कोई कानूनविद् ही स्पष्ट कर सकता है कि क्या यह कानूनी तौर पर वैध होगाए क्योंकि कोई भी अदालत में ऐसा किए जाने पर समीक्षा के लिए जा सकता है। इसलिए हम लोग इस पर कुछ नहीं कह सकते।  

राष्ट्रपति शासन लगाकर एकसाथ चुनाव संभव नहीं-संविधान विशेषज्ञ 
संविधान विशेषज्ञ सुभाष कश्यप के मुताबिक अगर केंद्र या उसकी कोई संस्था राष्ट्रपति शासन लगाकर विधानसभा चुनाव को लोकसभा चुनाव के साथ कराने पर विचार कर रही है तो यह संभव नहीं है। उन्होंने कहा कि किसी भी राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने की परिस्थितियां असाधारण होती हैं और उसके लिए राज्यपाल सिफारिश करते हैं। अगर कोई ये कहता है कि केंद्र की सिफरिश पर राष्ट्रपति शासन लगाकर एकसाथ चुनाव करायाम जा सकता है तो यह बिल्कुल गलत है। उन्होंने कहा कि इसमें कोई शक नहीं कि यह एक अच्छा विचार है कि सभी चुनाव एकसाथ हों, लेकिन इसका हल राष्ट्रपति शासन लगाकर नहीं निकाला जा सकता।

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