ऐसा पहली बार है कि केंद्र सरकार देशभर के 5247 बड़े बांधों की सुरक्षा जांच को लेकर गंभीर है। सरकार ने इसके लिए 'ब्रेक एनालिसिस' करने की तैयारी कर ली है, जिसमें उन 196 बांधों को इमरजेंसी एक्शन प्लान के तहत रखा गया है जो 100 साल से ज्यादा पुराने हैं।
इन 196 डैम में से 72 दक्षिण भारत के राज्यों और महाराष्ट्र के हैं। ब्रेक एनालिसिस एक ऐसी जांच है जिसमें बांध के संभावित खतरों और विफलताओं की जांच की जाती है। इसमें डैम से लोगों की सुरक्षा और खतरों से संबंधित सभी बिंदु शामिल हैं।
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सरकार ने इसके लिए पहले से ही 'डैम सेफ्टी बिल' ड्राफ्ट कर लिया है, जिस पर नीति आयोग दोबारा काम कर रहा है। इस बिल में सुरक्षा के दो मुद्दे हैं। पहला ये बाढ़ का खतरा और दूसरा लगातार पानी को रोकने की क्षमता का घटना। इन बिंदुओं की वजह से बड़े बांधों का रख-रखाव और महत्वपूर्ण हो गया है।
अक्टूबर 1987 में डैम सेफ्टी के लिए बनी राष्ट्रीय समिति
अक्टूबर 1987 में केंद्र ने बांधों की सुरक्षा को लेकर एक राष्ट्रीय समिति बनाई थी, जिससे भारत के सभी बांधों की मौजूदा स्थिति पर सुझाव मांगे गए थे। इस कमेटी की अध्यक्षता केंद्रीय जल आयोग के चेयरमैन ने की। इस समिति ने बांधों के रख-रखाव को लेकर महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
बांध विशेषज्ञ एस राजा राव जो कि कर्नाटक में जल संसाधन विभाग के सचिव थे कहते हैं कि बांधों के मामले में सुरक्षा का मुद्दा बेहद गंभीर है। राव कहते हैं कि सरकार इसके लिए लगातार कोशिशें करती रही हैं और एक बांध पुनर्वास और सुधार कार्यक्रम (DRIP) अभी भी चल रहा है।
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डीआरआईपी 2012 में शुरू हुआ जिसमें 2100 करोड़ के अनुमानित बजट के साथ पांच राज्यों (कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल, मध्यप्रदेश, ओडिशा) और दो एजेंसी (झारखंड में दामोदर वैली कॉर्पोरेशन और उत्तराखंड में जल विद्युत निगम लिमिटेड) काम कर रही हैं। प्रोजेक्ट में 3400 करोड़ खर्च होने का अनुमान है। डीआरआईपी के डायरेक्टर प्रमोद नारायन ने बताया कि 80 प्रतिशत बजट को विश्व बैंक फंड करने के लिए तैयार हो गया है।