बता दें कि केंद्र सरकार के विभिन्न मंत्रालयों और विभागों में उक्त दंड प्रक्रिया को लेकर असमंजस था। इस बाबत डीओपीटी के पास अनेक सवाल पहुंच रहे थे। इन सवालों में यह पूछा गया था कि किसी कर्मचारी या अधिकारी को आर्थिक दंड मिला है और कुछ समय बाद उसे किसी दूसरे केस में भी दंड दे दिया गया। दूसरा दंड उसे तब मिला है, जब पहली पेनल्टी जारी है। ऐसे में क्या दोनों दंड एक साथ चलेंगे या अलग-अलग उनका निपटारा होगा। संभव है कि किसी कर्मी पर दो से ज्यादा पेनल्टी लगी हों। ऐसे में कौन सी सजा पहले पूरी होगी।
डीओपीटी ने सभी मंत्रालयों एवं विभागों को पत्र जारी किया है। उसमें कहा गया है कि ऐसी स्थिति में पहले बड़ी सजा को देखा जाए। करेंसी पीरियड यानी पहली सजा की अवधि खत्म होने से पहले उससे बड़ी कोई पेनल्टी लगती है तो पहले मिली सजा को होल्ड कर दिया जाए। इसी तरह से तीसरी पेनल्टी लगी है तो तीनों में यह देखा जाएगा कि उनमें सबसे बड़ी पेनल्टी कौन सी है। उसका पहले निपटारा होगा। बाद में जो कम जुर्माने या दंड वाली पेनल्टी है, उसे भुगता जाएगा। इसके बाद सबसे कम दंड वाली पेनल्टी की बारी आएगी। अभी तक यह स्पष्ट नहीं हो पा रहा था कि ऐसे केस में सभी दंड एक साथ चलेंगे या बारी-बारी उन्हें भुगतना होगा।
अब डीओपीटी ने स्पष्ट कर दिया है कि यदि किसी कर्मचारी या अधिकारी की सजा चल रही है और तभी उसे दूसरा दंड मिल गया है तो इसमें यह देखा जाएगा कि बड़ा दंड कौन सा है। अगर संबंधित अथॉरिटी ने अपने आदेश में दंड भुगतने को लेकर कोई दिशा निर्देश जारी किया है तो उसे माना जाएगा। अगर वहां केवल पेनल्टी का उल्लेख है तो पहले बड़ी सजा भुगतनी होगी। जब तक बड़ी पेनल्टी पूरी नहीं हो जाती, तब तक पहले वाला दंड होल्ड पर रहेगा। जैसे ही बड़ी सजा खत्म होगी तो छोटी सजा की अवधि वहीं से शुरु हो जाएगी, जहां से उसे होल्ड किया गया था। ऐसे मामलों में स्केल डाउन होने और इंक्रीमेंट कटने जैसी सजा मिलती है। कई केसों में जब स्केल कम हो जाता है तो उसका असर इंक्रीमेंट पर भी पड़ता है।