केंद्र ने कर्नाटक उच्च न्यायालय में ट्विटर की ओर से दायर याचिका का विरोध करते हुए कहा कि उसने जानबूझकर भारत के कानूनों का पालन नहीं किया है और उसकी अवज्ञा की है। केंद्र ने कहा कि देश की सुरक्षा में इस सोशल मीडिया मंच की कोई भूमिका नहीं है।
दरअसल ट्विटर ने कर्नाटक उच्च न्यायालय में ट्वीट हटाने और अकाउंट ब्लॉक करने से जुड़े सरकारी आदेशों के खिलाफ याचिका दाखिल की है। इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने इस याचिका के खिलाफ गुरुवार को उच्च न्यायालय के समक्ष अपनी आपत्तियों के संबंध में पेश 101 पन्नों के बयान में यह दलील दी।
ट्विटर ने जानबूझकर कानूनों का पालन नहीं किया : केंद्र
राजनीतिक ट्वीट हटाने के निर्देश से संबंधित ट्विटर के दावों पर केंद्र ने कहा कि उसने सिर्फ असत्यापित खातों को ब्लॉक करने के लिए कहा था। सरकार ने याचिका को खारिज करने की मांग करते हुए कहा, "याचिकाकर्ता ने जानबूझकर कानूनों का अनुपालन नहीं किया और उनकी अवज्ञा की। प्रतिवादी नंबर-2 (केंद्र) की अनुवर्ती कार्रवाई और 27 जून 2022 को कारण बताओ नोटिस जारी होने के बाद ही याचिकाकर्ता ने अचानक सभी दिशा-निर्देशों पर अमल शुरू कर दिया, जिसकी वजह वही बेहतर जानता है।”
8 सितंबर को मामले में अगली सुनवाई
ट्विटर ने 39 यूआरएल (यूनिफॉर्म रिसोर्स लोकेटर) को ब्लॉक करने के संबंध में दायर आदेश को चुनौती दी है। मामले की अगली सुनवाई के लिए आठ सितंबर की तारीख मुकर्रर की गई है।
ट्विटर ने अपनी याचिका में क्या दावा किया है?
ट्विटर ने अपनी याचिका में दावा किया है कि ट्वीट हटाने और अकाउंट ब्लॉक करने से संबंधित सरकारी नोटिस से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रभावित होती है। कंपनी ने कहा कि उसके सोशल मीडिया मंच पर सामग्री साझा करने वाले लोगों को संबंधित सामग्री हटाने के लिए कहने से पहले कोई नोटिस जारी नहीं किया गया था।
हालांकि, सरकार ने इस पर आपत्ति दर्ज कराते हुए कहा कि चूंकि ट्विटर एक मध्यस्थ है, इसलिए उपयोगकर्ताओं को सूचित करना माइक्रो-ब्लॉगिंग वेबसाइट की जिम्मेदारी थी।
मंच को नहीं दी जा सकती सार्वजनिक व्यवस्था तय करने की अनुमति
केंद्र ने कहा, “जब सार्वजनिक व्यवस्था से जुड़ा कोई मुद्दा उठता है तो कार्रवाई करने की जिम्मेदारी सरकार पर होती है, न कि किसी मंच पर। लिहाजा, कौन-सी सामग्री राष्ट्रीय सुरक्षा या सार्वजनिक व्यवस्था से जुड़े मुद्दों के लिए सही है या नहीं, इसे तय करने की अनुमति मंच को नहीं दी जानी चाहिए।”
कंपनी राहत पाने की हकदार नहीं : सरकार
सरकार ने दलील दी कि ऑनलाइन मंच द्वारा बनाई गई कोई भी निजी नीति या नियम सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम 2000 के अधीन आते हैं। उसने कहा, “देश में सेवाएं मुहैया करा रहे विदेशी मंच यह दावा करने के हकदार नहीं होंगे कि भारतीय कानून और नियम उन पर लागू नहीं होंगे। ऐसा कोई भी दावा कानूनी रूप से स्वीकार्य नहीं है।” केंद्र ने ट्विटर की याचिका को इस आधार पर भी खारिज करने की मांग की कि कंपनी राहत पाने की हकदार नहीं है, क्योंकि वह भारत की नागरिक नहीं है।
सरकार ने कहा, “अनुच्छेद-21 में प्रदत्त अधिकार कृत्रिम कानूनी इकाइयों को उपलब्ध नहीं है और किसी भी विदेशी वाणिज्यिक इकाई के मामले में ये बहुत कम हैं। लिहाजा, मौजूदा याचिका भले ही अनुच्छेद-21 से जुड़े अधिकारों के उल्लंघन का आरोप लगाने का प्रयास करती हो, लेकिन यह सुनवाई योग्य नहीं है।”
'84 करोड़ भारतीय यूजर्स नफरत और देश विरोधी प्रचार से बचना हमारी जिम्मेदारी'
केंद्र ने कहा कि इंटरनेट का इस्तेमाल करने वाले 84 करोड़ से अधिक भारतीयों को भारत विरोधी प्रचार, फर्जी खबरों और नफरत भरे भाषणों से बचाना उसकी जिम्मेदारी है।
उसने कहा, “ऐसी सामग्री में देश की शांति को भंग करने की क्षमता है। इसलिए देश में सार्वजनिक व्यवस्था को नुकसान पहुंचने से रोकने के लिए प्रारंभिक चरण में ही ऐसी गलत सूचना और फर्जी खबरों का पता लगाना तथा उनका प्रसार रोकना जरूरी हो जाता है।”