सीबीआई की एफआईआर के मुताबिक, आरोपियों ने अहमदाबाद की इस कंपनी को काम देने के लिए टेंडर के नियमों का उल्लंघन किया था। हालांकि, अडानी इंटरप्राइजेज ने इस कार्रवाई पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है। सीबीआई का आरोप है कि एनसीसीएफ अफसरों द्वारा जानबूझकर कोताही बरती गई और इसमें दलाली खाई गई। अफसरों ने ऐसा बर्ताव किया जैसे वे लोकसेवक ही नहीं हैं और अडानी कंपनी के साथ मिलकर साजिश रची।
अफसरों ने कई बार निविदा प्रक्रिया में कंपनियों का चयन मनमाने तरीके से किया और अनियमितता बरती और जानबूझकर अडानी इंटरप्राइजेज का पक्ष लिया। हालांकि, आयातित कोयले की आपूर्ति के लिए अडानी को चुना जाना इसलिए भी हैरान करता है, क्योंकि वह अयोग्य हो गई थी।
सीबीआई ने अपनी एफआईआर में आरोप लगाया है कि एनसीसीएफ हैदराबाद की इकाई को एपीजेनको ने निविदा की जांच के लिए 29 जून, 2010 को कहा था, जिसे इसने अपने दिल्ली स्थित मुख्यालय में सिंघल तक पहुंचा दिया था। उसी दिन मुख्यालय ने 2.25 फीसदी के फायदे पर काम करने वाली एक कंपनी महर्षि ब्रदर्स कोल लिमिटेड (एमबीसीएल) को कोयला ढोने के लिए चुन लिया।
सात जुलाई को निविदा की अंतिम समयसीमा के चलते प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया गया। अमूमन ऐसे काम के लिए खुले तौर पर निविदा मंगाई जाती है। छह दिन बाद सात जुलाई को एपीजेनको ने एनसीसीएफ, हैदराबाद को सूचित किया कि निविदा की समयसीमा बढ़ाकर 12 जुलाई कर दी गई है। इसके बाद महर्षि ब्रदर्स को आवंटित काम रद्द कर दिया गया और फिर से खुले तौर पर निविदा मंगाई गई।
टेंडर की नई नोटिस पर चर्चा और मंजूरी एनसीसीएफ के तीन वरिष्ठ अफसरों सिंघल, गुप्ता और सिंह ने दी थी। इन पर यह भी आरोप है कि इन्होंने मुख्यालय स्तरीय समिति से सलाह किए बगैर दिशानिर्देशों का उल्लंघन किया। बाकी छह बोली लगाने वाली अडानी इंटरप्राइजेज, एमबीसीएल, व्योग ट्रेड लिंक्स, स्वर्ण प्रोजेक्ट्स, गुप्ता कोल इंडिया और क्योरी ओरेमिन ने टेंडर पर 10 जुलाई, 2010 को जवाब दिया था।
इनकी सभी जानकारी एनसीसीएफ की हैदराबाद इकाई ने उसी दिन मुख्यालय भेज दी थी। गुप्ता कोल ने 11.3 फीसदी, एमबीसीएल ने 2.25 फीसदी फायदे पर काम करने का जिक्र किया था, जबकि बाकी कंपनियों ने ऐसी कोई जानकारी नहीं दी थी। बाद में गुप्ता कोल, क्योरी ओरेमिन और स्वर्ण प्रोजेक्ट्स के प्रस्ताव एनसीसीएफ ने यह कहकर खारिज कर दिए थे कि उन्होंने निविदा की शर्तों का पालन नहीं किया था।
सीबीआई का आरोप है कि एनसीसीएफ के वरिष्ठ अफसरों ने बाद में अडानी इंटरप्राइजेज के साथ डील की और उसे फायदा पहुंचाया। अडानी की निविदा खारिज होने के बावजूद उसके प्रतिनिधि मुनीश सहगल ने दिल्ली में एनसीसीएफ के मुख्यालय में 10 जुलाई, 2010 को बैठकर डील की। उसी दिन यह बताया गया कि 2.25 फीसदी के फायदे पर अडानी काम करने के प्रस्ताव पर राजी हो गई है। सीबीआई ने यह भी आरोप लगाया है कि व्योम ट्रेड लिंक्स अडानी इंटरप्राइजेज की छद्म कंपनी है, जिसने उसे 16.81 करोड़ का लोन कंपनी को दिया था।
हमने कुछ गलत नहीं किया : अडानी
यह मामला बहुत पुराना है और अभी प्राथमिक जांच रिपोर्ट ही आई है। अडानी इंटरप्राइजेज ने इस मामले में तय प्रक्त्रिस्या और सभी कानूनों का पालन किया है। कंपनी ने कोयला सप्लाई में कोई गड़बड़ी नहीं की। हम इस बारे में जांच के एजेंसी के सभी सवालों का जवाब देंगे और उन्हें सही तथ्य देंगे।
- प्रवक्ता, अडानी समूह