तमिलनाडु में पुलिस हिरासत में पिता-पुत्र की मौत
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तमिलनाडु के तूतीकोरिन में क्राइम ब्रांच-सीआईडी ने दो सब-इंस्पेक्टर सहित छह लोगों को पिता-पुत्र को पुलिस हिरासत में बुरी तरह से पीटने से हुई मौत के मामले में गिरफ्तार किया है। पी जयराज और उनके बेटे जे बेनिक्स की पिछले महीने मौत हो गई थी। इसके बाद राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने हिरासत में हुई मौत पर छह हफ्ते के अंदर राज्य के डीजीपी को संबंधित दस्तावेजों के साथ एक विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया था। इस घटना ने एक बार फिर हिरासत में होने वाली मौतों में पुलिस अधिकारियों को सजा मिलने की कम दर की ओर ध्यान आकर्षित किया। ऐसे में जानें क्यों आरोपी पुलिसवाले बच जाते हैं।
कौन करता है निगरानी
कानून के अनुसार भारत में जेलों की निगरानी एक बोर्ड द्वारा की जाती है, जिसमें अन्य लोगों के साथ जिलाधिकारी या उप-मंडल अधिकारी और सिविल सोसायटी के सदस्य शामिल होते हैं। उन्हें न केवल उनके उचित कामकाज पर ध्यान देना होता है बल्कि कैदियों की परेशानी का भी निवारण करना होता है। हालांकि 2016 में राष्ट्रमंडल मानवाधिकार पहल की एक रिपोर्ट के अनुसार, देश भर में लगभग 1,400 जेलों में से केवल पांच पर नजर रखी जा रही थी और केवल चार राज्यों ने अपनी जेलों में स्वतंत्र आगंतुकों को नियुक्त किया था।
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पुलिसकर्मियों को दोषी ठहराने का अनुपात है बहुत कम
पुलिस हिरासत में होने वाली मौतों के लिए बहुत कम पुलिसकर्मियों को दोषी ठहराया गया है। इसका कारण है कि इस तरह की मौतों का रिकॉर्ड रखने का अनुपात बहुत कम है। उदाहरण के लिए 2018 में जिसका कि डाटा उपलब्ध है, में पांच प्रतिशत से कम हिरासत में हुई मौतों के लिए पुलिस के अत्याचार को जिम्मेदार ठहराया गया था।
कोई नहीं होता आरोपी
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार 2001 और 2018 के बीच, देश भर में 1,727 लोगों की हिरासत में मौतें हुईं। इसमें से 334 पुलिसवालों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की गई और केवल 26 को दोषी ठहराया गया। वास्तव में 2015 से 2018 तक हिरासत में हुई मौत के लगभग 180 मामलों में, जहां मजिस्ट्रियल जांच का आदेश दिया गया था, एक भी पुलिसकर्मी को दोषी नहीं ठहराया गया, हालांकि 80 से अधिक के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की गई थी।
भारत ने पास नहीं किया कानून
भारत ने अत्याचार और अन्य क्रूर, अमानवीय और अपमानजनक बर्ताव या सजा के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन से प्रमाणित 'द प्रिवेंशन ऑफ टॉर्चर' बिल को पारित करने में असफल रहा है। जबकि भारत इसका हस्ताक्षरकर्ता है। इसका मतलब है कि हिरासत में मौत मामले मे दोषियों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई करनी पड़ेगी।