एक सवाल के जवाब में पिछले सप्ताह जब गृह राज्य मंत्री ने संसद को बताया कि भारत सरकार ने नीतिगत फैसला किया है कि जनगणना में एससी और एसटी के अलावा अन्य जाति-वार आबादी की गणना नहीं कराएगी तो इस पर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार समेत कई नेता जाति आधारित जनगणना कराने की मांग करने लगे। इन नेताओं का तर्क है कि इससे असल मायने में जरूरतमंदों को सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक मदद मिलेगी। नीतीश कुमार, जीतन राम मांझी और रामदास अठावले से पहले भारतीय जनता पार्टी की नेता पंकजा मुंडे भी यह मांग उठा चुकी हैं।
जाति आधारित जनगणना की मांग क्यों?
जाति आधारित जनगणना के लिए बिहार विधान मंडल और फिर बाद में बिहार विधानसभा में सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पहले ही पारित हो चुका है। महाराष्ट्र विधानसभा में भी केंद्र सरकार से जाति आधारित जनगणना कराए जाने की मांग के प्रस्ताव को हरी झंडी मिल चुकी है। महाराष्ट्र, ओडिशा, बिहार और यूपी में कई राजनीतिक दलों की मांग है कि जाति आधारित जनगणना कराई जाए। इस तरह केंद्र पर जातिगत जनगणना कराने को लेकर दबाव बनाने की कवायद चल रही है। दरअसल जातिगत जनगणना के आधार पर ही सियासी पार्टियों को अपना समीकरण और चुनावी रणनीति बनाने में मदद मिलेगी। सभी पार्टियों की दिलचस्पी अन्य पिछड़ा वर्ग यानी ओबीसी की सटीक आबादी जानने को लेकर है। अभी तक सियासी पार्टियां लोकसभा और विधानसभा सीटों पर केवल अनुमानों के आधार पर ही रणनीति बनाती रही है।
ओबीसी मतदाताओं का चुनावों पर बड़ा प्रभाव
ओबीसी मतदाताओं का चुनावों पर बहुत प्रभाव है। भाजपा के हिंदुत्व का एजेंडा अब ओबीसी और अति पिछड़ी जातियों के सहारे ही चल रहा है, खासतौर पर उत्तर प्रदेश में। यहां के चुनाव में तो ओबीसी निर्णायक भूमिका में होते हैं। इसलिए सभी पार्टियां ओबोसी को साधना चाहती हैं। मोटे तौर पर कहें तो उत्तर प्रदेश में 40 से 43 फीसदी ओबीसी मतदाता हैं। इसलिए योगी मंत्रिमंडल में उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य समेत मंत्रिमंडल में पहले से बड़े ओबीसी चेहरे शामिल हैं। 2014 के लोकसभा चुनाव की बात हो 2019 के बड़ी संख्या में ओबीसी मतदाताओं ने भाजपा को वोट किया था। इसी तरह बिहार की बात करें तो राज्य में 26 फीसदी ओबीसी हैं और नीतीश कुमार ओबीसी को साधन के लिए ही जाति आधारित जनगणना की वकालत कर रहे हैं।
नीतीश कुमार का कहना है कि जातिगत जनगणना सभी तबकों के विकास के लिए आवश्यक है। किस इलाके में किस जाति की कितनी संख्या है, जब यह पता चलेगा तभी उनके कल्याण के लिए ठीक ढंग से काम हो सकेगा। जाहिर है, जब किसी इलाके में एक खास जाति के होने का पता चलेगा तभी सियासी पार्टियां उसी हिसाब से मुद्दों और उम्मीदवारों के चयन से लेकर अपनी तमाम रणनीतियां बना सकेंगी। दूसरी तरफ सही संख्या पता चलने से सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थाओं में उन्हें उचित प्रतिनिधत्व देने का रास्ता साफ हो सकेगा। मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू होने के बाद अभी ओबीसी के लिए 27 फीसदी आरक्षण का प्रावधान है।
देश में हर दस साल में जनगणना होती है। साल 2011 में आखिरी जनगणना हुई थी और अब 2021 की जनगणना होनी है। अब तक इसे कोरना महमारी के कारण टाल दिया गया था लेकिन अब सरकार इस प्रकिया को शुरू करना चाहती है। ऐसे में नेताओं ने अलग-अलग 2021 की जनगणना में जाति आधारित जनगणना कराने की मांग शुरू कर दी है। देश में अनुसूचित जाति और जनजाति की जनगणना इसलिए कराई जाती है क्योंकि संविधान के तहत उन्हें सदन के अंदर आरक्षण दिया गया है।
आखिरी बार कब हुई जाति आधारित जनणगना
बताया जाता है कि देश में जनगणना की शुरुआत 1881 में हुई थी। लेकिन उस समय फोकस जाति पर नहीं बल्कि शिक्षा, रोजगार और मातृभाषा के सवाल पर हुआ करता था। देश में आखिरी बार जाति आधारित जनगणना 1931 में हुई थी। उस समय पाकिस्तान और बांग्लादेश भी भारत का हिस्सा थे। तब देश आबादी 30 करोड़ के करीब थी। अब तक उसी आधार पर यह अनुमान लगाया जाता रहा है कि देश में किस जाति के कितने लोग हैं। हालांकि भारत में आजादी से पहले 1941 में जातियों की गिनती हुई थी लेकिन दूसरे विश्वयुद्ध के कारण आंकड़ों को संकलित नहीं किया जा सका था।
आजादी के बाद सरकार ने जातिगत जनगणना को नहीं कराने का फैसला किया। 1951 में तत्कालीन सरकार के पास भी जातीय जनगणना कराने का दबाव बनाने के लिए एक प्रस्ताव भी आया था। लेकिन तत्कालीन गृह मंत्री सरदार पटेल ने यह कहकर उस प्रस्ताव को खारिज कर दिया था कि जातीय जनगणना कराए जाने से देश का सामाजिक ताना-बाना बिगड़ सकता है। स्वतंत्र भारत में 1951 से 2011 तक की प्रत्येक जनगणना में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों पर आंकड़े प्रकाशित किए गए हैं, लेकिन किसी अन्य जातियों पर नहीं।
इस तरह जाति आधारित जनगणना नहीं होने से सटीक तौर पर यह पता नहीं चल पाया कि ओबीसी और ओबीसी के भीतर विभिन्न समूहों की कितनी आबादी है। 1931 में जाति आधारित जनगणना के आधार पर ही अब तक यह माना जाता है कि देश में 52 फीसदी ओबीसी आबादी है। मंडल आयोग ने भी यही अनुमान लगाया कि ओबीसी आबादी 52% है। इसी तरह ओबीसी की आबादी को लेकर चुनाव के समय राजनीतिक दल लोकसभा और विधानसभा सीटों पर अपना अनुमान लगाती है।
कितनी बार हुई है जाति जनगणना की मांग?
जाति आधारित जनगणना की मांग हर जनगणना से पहले होती रही है। ऐसी मांग आमतौर पर ओबीसी और अन्य वंचित वर्गों के नेता करते हैं, जबकि उच्च जातियों के नेता इस विचार का विरोध करते रहे हैं। ये पहला मौका नहीं है जब देश में जाति आधारित जनगणना की मांग उठने लगी है। पिछली जनगणना 2011 के दौरान भी मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद यादव और शरद यादव जैसे नेताओं ने ऐसी ही जनगणना की मांग की थी। सपा प्रमुख अखिलेश यादव भी जाति आधारित जनगणना की मांग उठा चुके हैं।
अब तक सरकारों का क्या रुख रहा है?
पहली बार 2010 में मनमोहन सिंह की नेतृत्व वाली यूपीए दो की सरकार ने इस पर कदम उठाया। तत्कालीन कानून मंत्री वीरप्पा मोइली ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को पत्र लिखकर 2011 की जनगणना में जातिगत आंकड़े एकत्र करने की बात कही थी। संसद में भी विपक्ष ने इस पर एक बार खूब हंगामा मचाया था। तब मनमोहन सिंह ने सदन को भरोसा दिलाया था कि सरकार इस पर जरूर फैसला करेगी। कुछ समय बाद तत्कालीन वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी के नेतृत्व में मंत्रियों के एक समूह का गठन किया गया। कई दौर के विचार-विमर्श के बाद, यूपीए सरकार ने सामाजिक-आर्थिक जनगणना के साथ जाति आधारित जनगणना कराने का फैसला किया। लेकिन 2011 की जनगणना में आंकड़े तो जुटाए तो गए लेकिन प्रकाशित नहीं किए गए।
वहीं दूसरी तरफ देखें तो अभी भले ही गृह राज्य मंत्री ने संसद में यह बयान देकर सरकार का रुख साफ कर दिया है लेकिन केंद्र सरकार ने एक बार इसकी कोशिश जरूर की थी। इसकी एक झलक तब देखने को मिली जब पत्र सूचना कार्यालय की एक प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया कि 31 अगस्त, 2018 को, तत्कालीन गृह मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में एक बैठक हुई थी, जिसमें जनगणना 2021 की तैयारियों की समीक्षा की गई। इसमें पहली बार ओबीसी का आंकड़ा एकत्र करने की भी बात कही गई थी। तब के मीडिया रिपोर्टों में भी कहा गया कि सरकार ने 2001 की जनसंख्या में ओबीसी का अलग से आंकड़ा एकत्र करने पर चर्चा की है। लेकिन फिर उसके बाद केंद्र सरकार इस मुद्दे पर मौन हो गई।
बताया जा रहा है कि दरअसल इस मुद्दे पर केंद्र सरकार संघ के रुख के हिसाब से आगे बढ़ना चाहती है। वैसे संघ ने हाल में जाति आधारित जनगणना को लेकर कोई बयान नहीं दिया है, लेकिन इससे पहले जब भी इसकी बात हुई संघ ने इसका विरोध किया है। 2011 की जनगणना से पहले जब इस मुद्दे पर काफी बहस तेज हो गई थी, उस दौरान 24 मई 2010 को तब संघ के सर-कार्यवाह सुरेश भैयाजी जोशी ने नागपुर से अपने एक बयान में कहा था कि हम जाति दर्ज करने का विरोध करते हैं। उन्होंने कहा था कि जाति आधारित जनगणना संविधान में बाबासाहेब अंबेडकर की जातिविहीन समाज की परिकल्पना के विचार के खिलाफ है और सामाजिक सद्भाव बनाने के लिए चल रहे प्रयासों को कमजोर करेगी।