आईसीएमआर और मद्रास डायबिटीज रिसर्च फाउंडेशन के अध्ययन में खुलासा हुआ है कि भारतीय वयस्क 62% कैलोरी कार्बोहाइड्रेट से लेते हैं, जिससे मोटापा और डायबिटीज का खतरा बढ़ रहा है। सफेद चावल, गेहूं और चीनी इसका मुख्य स्रोत हैं। 21 राज्यों में चीनी का सेवन तय मानक से अधिक मिला, जबकि प्रोटीन की भारी कमी भी पाई गई।
हमारे भोजन की थाली अब सेहत पर भारी पड़ने लगी है। भारतीयों का भोजन कार्बोहाइड्रेट से भरा हुआ है जिससे मधुमेह और मोटापे का खतरा तेजी से बढ़ रहा है। यह दावा नई दिल्ली स्थित भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) ने 15 साल से जारी एक अध्ययन में किया है जिसे मंगलवार को मद्रास डायबिटीज रिसर्च फाउंडेशन के साथ मिलकर आईसीएमआर-आईएनडीआईएबी नाम से जारी किया गया।
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अध्ययन के अनुसार, भारतीय वयस्क औसत 62% कैलोरी कार्बोहाइड्रेट से लेते हैं जो दुनिया के उच्चतम स्तरों में शामिल है। इसमें अधिकांश हिस्सा सफेद चावल, गेहूं और चीनी से आता है। देश के 21 राज्यों में चीनी का सेवन राष्ट्रीय मानक से ज्यादा मिला है। केवल कर्नाटक, महाराष्ट्र और गुजरात जैसे राज्यों में ही बड़ी संख्या में लोग मोटे अनाज (मिलेट्स) का सेवन कर रहे हैं। इतना ही नहीं, अध्ययन में पाया कि भारतीय थाली में प्रोटीन की भारी कमी है।
क्या कहता है अध्ययन...
देश की बदलती आहार आदतें अब गंभीर स्वास्थ्य संकट का संकेत दे रही हैं। यह अध्ययन प्रतिष्ठित पत्रिका नेचर मेडिसिन में प्रकाशित हुआ है। 15 साल तक चले इस सर्वेक्षण में 36 राज्यों से 1,21,077 वयस्कों को शामिल किया गया। यह अध्ययन बताता है कि अत्यधिक कार्बोहाइड्रेट का सेवन लोगों को सीधे तौर पर मधुमेह और मोटापा ग्रस्त बनाता है जबकि कई लोगों को इस बीमारी की दहलीज तक यानी प्री डायबिटीज भी पैदा करता है।
यदि कुल कैलोरी में से मात्र 5% कार्बोहाइड्रेट घटाकर उतनी ही मात्रा में पौधों या डेयरी से मिलने वाला प्रोटीन शामिल करें तो यह खतरा घट सकता है लेकिन ध्यान रहे, सफेद चावल को गेहूं या मिलेट्स से बदलने भर से लाभ नहीं मिलता, जब तक कार्बोहाइड्रेट का कुल अनुपात घटाया न जाए।
सिर्फ अनाज बदलने से कुछ नहीं होगा...
एमडीआरएफ की अध्यक्ष और अध्ययन की प्रमुख लेखिका डॉ. आर.एम. अंजना ने कहा कि भारतीय आहार में कार्बोहाइड्रेट की बहुतायत और गुणवत्ता प्रोटीन की कमी गंभीर खतरा है। बदलाव केवल अनाज बदलने से नहीं, बल्कि कुल कार्बोहाइड्रेट घटाने से होगा। वहीं देश के चर्चित मधुमेह रोग विशेषज्ञ डॉ. वी. मोहन का कहना है कि अब हमारे पास पिछले 15 साल की स्थिति का वैज्ञानिक लेखा जोखा है। इस आधार पर यह कहा जा सकता है कि हमें खाद्य सब्सिडी और जन स्वास्थ्य से जुड़ी जागरूकता को इस तरह बदलना चाहिए कि लोग कार्बोहाइड्रेट कम करें।