केंद्रीय अर्धसैनिक बलों 'सीएपीएफ' के अफसरों और जवानों को अपने हितों के लिए अदालतों का दरवाजा खटखटाना पड़ रहा है। खास बात है कि अधिकांश मामलों में सीएपीएफ कार्मिकों को जीत मिल रही है, लेकिन सरकार द्वारा अदालतों के फैसलों को लागू नहीं किया जा रहा है। एक केस में केंद्र सरकार, हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में चली जाती है तो वहीं दूसरे मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ संसद में नया एक्ट पास करा लिया जाता है। केंद्रीय अर्धसैनिक बलों में 'पुरानी पेंशन' बहाली, इंस्पेक्टरों को 54 सौ रुपये का ग्रेड 'पे' देना या कैडर अफसरों की पदोन्नति एवं दूसरे वित्तीय फायदों से जुड़ा 'ओजीएएस' का मुद्दा, आदि मामलों पर जवानों/अफसरों को सरकार से कोई राहत नहीं मिल सकी। इन केसों में कार्मिकों को अभी तक अदालतों में संघर्ष करना पड़ रहा है।
फैसला नंबर-1
केंद्रीय अर्धसैनिक बलों में 'पुरानी पेंशन' लागू हो, इसके लिए दिल्ली हाईकोर्ट ने जनवरी 2023 में फैसला सुनाया था। दिल्ली उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में केंद्रीय अर्धसैनिक बलों को 'भारत संघ के सशस्त्र बल' माना था। दूसरी तरफ केंद्र सरकार, सीएपीएफ को सिविलियन फोर्स बताती है। अदालत ने इन बलों में लागू 'एनपीएस' को समाप्त करने की बात कही। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था, चाहे कोई आज इन बलों में भर्ती हुआ हो, पहले कभी भर्ती हुआ हो या आने वाले समय में भर्ती होगा, सभी जवान और अधिकारी, पुरानी पेंशन स्कीम के दायरे में आएंगे। केंद्र सरकार ने इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में स्टे ले लिया। तब से यह केस सर्वोच्च न्यायालय में विचाराधीन है।
फैसला नंबर-2
सर्वोच्च न्यायालय ने 23 मई 2025 को ओजीएएस, गैर-कार्यात्मक वित्तीय उन्नयन, कैडर समीक्षा, आईपीएस प्रतिनियुक्ति, भर्ती नियमों के पुनर्गठन व संशोधन की मांग वाली कई याचिकाओं पर एक अहम फैसला सुनाया था। देश की सीमाओं पर सुरक्षा बनाए रखने के साथ-साथ आंतरिक सुरक्षा कर्तव्यों के निर्वहन में सीएपीएफ की भूमिका महत्वपूर्ण है। केंद्रीय गृह मंत्रालय को छह माह के भीतर इस फैसले का पालन करना था। इस अवधि के दौरान केंद्र सरकार, रिव्यू पिटीशन में चली गई। गत वर्ष 28 अक्तूबर को रिव्यू पिटीशन भी डिसमिस कर दी गई। इसके बाद सरकार ने नया सीएपीएफ एक्ट, जिसे 'सीएपीएफ (सामान्य प्रशासन) अधिनियम, 2026 कहा गया, ले आई। संसद में बिल पास होने के बाद यह नया कानून लागू कर दिया गया। इस मामले में अवमानना का केस और नए एक्ट को चुनौती, ये केस सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है।
फैसला नंबर-3
वित्त मंत्रालय ने 2008 में एक 'कार्यालय ज्ञापन' जारी किया था। इसमें कहा गया कि केंद्र सरकार में जिन कर्मियों का 48 सौ रुपये का 'ग्रेड पे' है और उन्होंने इसमें चार साल की सेवा पूरी कर ली है तो उनका ग्रेड 'पे' 54 सौ रुपये हो जाएगा। खास बात यह रही कि यह नियम, केंद्रीय अर्धसैनिक बलों को छोड़कर केंद्र सरकार के बाकी सभी विभागों में लागू हो गया। सीएपीएफ में यह नियम स्वत: ही लागू नहीं होता। इसे लागू कराने के लिए अदालतों का सहारा लेना पड़ता है। हाल के वर्षों में आईटीबीपी के इंस्पेक्टर सुशील कुमार ने दिल्ली कोर्ट से यह लड़ाई जीती थी। इसके बावजूद उन्हें फायदा नहीं मिला। उन्होंने अवमानना याचिका लगाई। फिर भी लड़ाई आसान नहीं रही। वे सुप्रीम कोर्ट तक गए। फिलहाल उन्हें यह फायदा मिल गया है। इसी आधार पर बीएसएफ के इंस्पेक्टरों ने अदालत से अपने हक में यह आदेश जारी कराया। सीआरपीएफ के इंस्पेक्टरों को भी दिल्ली हाईकोर्ट से जीत मिली, लेकिन सरकार ने किसी भी बल में उक्त ग्रेड पे लागू नहीं किया। केंद्रीय अर्धसैनिक बलों के इंस्पेक्टर, अदालतों के चक्कर काटने पर मजबूर हैं।
बीएसएफ के पूर्व एडीजी एसके सूद ने क्या कहा?
कैडर अफसरों के पास कार्य करने की क्षमता और लंबा अनुभव है, लेकिन पॉलिसी लेवल पर निर्णय लेने में इनका इस्तेमाल बहुत कम है, जबकि बॉर्डर या इंटरनल सिक्योरिटी में इनका बड़ा योगदान है। कोर्ट से लड़ाई जीतने के बाद भी कैडर अफसरों को कोई राहत नहीं दी जा रही। 2015 में जब दिल्ली हाईकोर्ट ने कैडर अफसरों के हक में फैसला दिया तो सरकार उसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में चली गई। 2019 में सरकार की एसएलपी डिसमिस हो गई, लेकिन फिर भी ओजीएएस/एनएफएफयू जैसे मुद्दे अनसुलझे रहे। सीआरपीएफ और बीएसएफ में तो 2016 के बाद से कैडर रिव्यू ही नहीं हुआ है। 23 मई 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने कैडर अफसरों के हित में ऐतिहासिक फैसला सुनाया। उसे समाप्त कराने के लिए सरकार ने हर संभव कोशिश की है। शीर्ष कोर्ट में कुछ नहीं हुआ तो केंद्र सरकार ने सर्वोच्च अदालत के फैसले के खिलाफ संसद में 'सीएपीएफ (सामान्य प्रशासन) अधिनियम, 2026 पास करा लिया।
एसोसिएशन के चेयरमैन और महासचिव ने कहा
कॉन्फेडरेसन ऑफ एक्स पैरामिलिट्री फोर्सेस मार्टियरस वेलफेयर एसोसिएशन के महासचिव रणबीर सिंह कहते हैं, जब केंद्र सरकार ने दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले पर स्टे लिया, तभी यह बात साफ हो गई थी कि सरकार सीएपीएफ को 'पुरानी पेंशन' के दायरे में नहीं लाना चाहती। जवानों की अनेकों समस्याएं वर्षों से लंबित पड़ी हैं, सरकार को सैंकड़ों ज्ञापन दिए हैं, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। इसके विपरित जवान और अफसर, अदालत में अपने हितों की लड़ाई जीत रहे हैं तो सरकार उन फैसलों को भी लागू नहीं कर रही। सीआरपीएफ के पूर्व एडीजी एवं एसोसिएशन के चेयरमैन एचआर सिंह बताते हैं, दिल्ली हाईकोर्ट का एक ऐतिहासिक फैसला था। अदालत ने स्पष्ट तौर पर कहा था कि 'सीएपीएफ', 'भारत संघ के सशस्त्र बल' हैं। इसका मतलब, सीएपीएफ भी आर्मी/नेवी/वायु सेना की तरह सशस्त्र बल हैं। इन्हें भी पुरानी पेंशन मिलनी चाहिए। जैसे ओपीएस के फैसले को पलटने का प्रयास हो रहा है, वैसा ही अब कैडर अधिकारियों के मामले में प्रतीत हो रहा है। मतलब साफ है कि वर्षों से पदोन्नति एवं वित्तीय फायदों से वंचित कैडर अफसरों को सरकार, राहत नहीं देना चाहती। सरकार को सीएपीएफ के जवानों और अफसरों की लंबित समस्याओं को लेकर संसद का विशेष सत्र बुलाना चाहिए।