सुप्रीम कोर्ट ने सेंट्रल विस्टा परियोजना को मंजूरी देते हुए कहा कि अदालत से यह उम्मीद नहीं की जानी चाहिए कि वह किसी परियोजना पर खर्च होने वाली रकम को किसी अन्य चीज पर खर्च करने का आदेश दे।
अदालत द्वारा सरकार को परियोजना पर पैसा खर्च करने से नहीं रोका जाना चाहिए। कोर्ट नीतिगत मामलों के अमल पर पूरी तरह रोक नहीं लगा सकती और उससे शासन करने का आह्वान नहीं किया जा सकता।
जस्टिस एएम खानविलकर की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा है कि नीतिगत मामलों में अदालत को शिथिल होकर खुद पर पूर्ण विराम लगा देना चाहिए। बिना किसी कानूनी आधार के अदालत को सरकार को नैतिकता का पाठ नहीं पढ़ाया जाना चाहिए।
किसी विकास परियोजना की तत्काल जरूरत है या उस पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है या बजटीय कारणों से स्थगित किया जाना चाहिए या शुरू करने के लिए ‘ए’ अथॉरिटी से अनुमति की आवश्यकता है न कि अथॉरिटी ‘बी’ से यह सब चीजें कार्यपालिका के नीतिगत निर्णय से जुड़ी हैं।
हम सोचने पर मजबूर हैं कि क्या किसी कानूनी शासनादेश के अभाव में हम विकास की एक विशेष दिशा पर ध्यान केंद्रित करने में सरकार की बुद्धिमत्ता पर सवाल उठा सकते हैं? दरअसल, याचिकाकर्ताओं ने इस परियोजना की वैधता पर सवाल उठाए थे।
वहीं सरकार की ओर से दलील दी गई थी कि इस प्रोजेक्ट से सालाना करीब 1000 करोड़ रुपये की बचत होगी, जो कि फिलहाल 10 इमारतों में चल रहे मंत्रालयों के किराये में खर्च होता है। साथ ही सरकार का यह भी कहना है कि इस प्रोजेक्ट से मंत्रालयों के बीच समन्वय में भी सुधार होगा।
कानून का पालन होने पर अदालत बाधक नहीं बन सकती
शीर्ष अदालत ने कहा है कि एक बार सरकार अपने बैठने के लिए एक नई जगह ने निर्माण का निर्णय लेती है या एक राजमार्ग या बांध या स्कूल या विश्वविद्यालय का निर्माण करने का निर्णय लेती है और ये सब करने के लिए वह कानून का पालन करती है तो अदालत को बाधक नहीं बनना चाहिए।
अदालत को उस परियोजना को लेकर अपनी धारणा को नहीं जोड़ना चाहिए। अदालतों के लिए यह महत्वपूर्ण है कि वह सभी परिस्थितियों में अवगत रहें और उसे सिर्फ इसलिए हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए कि असंतुष्ट वर्ग की धारणा में एक बेहतर विकल्प उपलब्ध है।