सवाल उठ रहा है कि क्या इंदिरा साहनी केस में तय की गई आरक्षण की अधिकतम 50 प्रतिशत सीमा का बैरियर टूट गया है? क्या अब SC-ST, OBC के आरक्षण का दायरा भी बढ़ाया जा सकता है? कोर्ट के आदेश का मतलब क्या है? आइए जानते हैं....
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को आर्थिक रूप से कमजोर सामान्य वर्ग यानी EWS के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण को सही ठहराया है। मतलब अब EWS आरक्षण जारी रहेगा। सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने 3-2 के बहुमत से आरक्षण पर एक नई लकीर खींच दी है। इस फैसले बाद कई लोग कह रहे हैं कि अब SC-ST, OBC के आरक्षण का दायरा भी बढ़ सकता है।
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ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या इंदिरा साहनी केस में तय की गई आरक्षण की अधिकतम 50 प्रतिशत सीमा का बैरियर टूट गया है? क्या अब SC-ST, OBC के आरक्षण का दायरा भी बढ़ाया जा सकता है? कोर्ट के आदेश का मतलब क्या है? आइए जानते हैं....
पहले जानिए सुप्रीम कोर्ट ने क्या फैसला दिया?
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को अनारक्षित वर्ग के आर्थिक रूप से कमजोर तबके को 10% आरक्षण देने वाले 103वें संविधान संशोधन की संवैधानिक वैधता पर मुहर लगा दी। कोर्ट ने कहा कि यह संविधान संशोधन किसी भी तरह से असंवैधानिक नहीं है। जस्टिस दिनेश माहेश्वरी ने कहा कि आरक्षण के लिए 50 फीसदी की तय सीमा के आधार पर भी ईडब्ल्यूएस आरक्षण मूल ढांचे का उल्लंघन नहीं है, क्योंकि 50 फीसदी आरक्षण की सीमा अपरिवर्तनशील नहीं है।
EWS आरक्षण के साथ केंद्रीय संस्थानों में आरक्षण की कुल सीमा 59.50% तक पहुंच गई है। कोर्ट में जस्टिस दिनेश माहेश्वरी, जस्टिस बेला एम त्रिवेदी और जस्टिस जेबी पारदीवाला ने आर्थिक आरक्षण को सही ठहराया, जबकि चीफ जस्टिस यूयू ललित और जस्टिस रवींद्र भट्ट ने इसके विरोध में अपनी राय रखी।
तो क्या अब 50% से भी ज्यादा हो सकेगा जातिगत आरक्षण?
इसे समझने के लिए हमने सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता अश्वनी उपाध्याय से बात की। उन्होंने कहा, 'जो लोग बोल रहे हैं कि सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद जातिगत आरक्षण का दायरा 50 प्रतिशत से भी आगे बढ़ सकता है, उन्हें इस जजमेंट को फिर से समझने की जरूरत है। कोर्ट की संविधान पीठ ने 3-2 से EWS आरक्षण को सही ठहराया है। इसका मतलब यह नहीं है कि अब जातिगत आरक्षण 50% से अधिक हो सकता है।'
अश्वनी आगे कहते हैं, 'कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है कि जातिगत आरक्षण का दायरा 50 प्रतिशत तक ही रहेगा। EWS कैटेगिरी इस 50 प्रतिशत दायरे में नहीं आती, बल्कि इससे हटकर है। यह जातिगत आधार पर नहीं, बल्कि आर्थिक आधार पर दिया जाता है। यह एक नई व्यवस्था है, इसलिए संविधान के संशोधन में कोई त्रुटि नहीं है।'
दूसरी ओर इलाहाबाद हाईकोर्ट के अधिवक्ता सुरेंद्र सरोज कहते हैं, 'आरक्षण किसी भी रूप में 50 प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकता था। इंदिरा साहनी का यह जजमेंट आज तक माना जाता था। तमिलनाडु, केरल, बिहार समेत कई राज्यों ओबीसी आरक्षण का दायरा बढ़ाने की मांग हुई थी, लेकिन तब भी इंदिरा साहनी के इस जजमेंट का हवाला देते हुए याचिका खारिज कर दी जाती थी। अब सुप्रीम कोर्ट के नए फैसले से आरक्षण का दायरा बढ़ने की एक नई उम्मीद जगी है।'
संविधान का 103वां संशोधन क्या है?
जनवरी 2019 में देश में EWS आरक्षण की अधिसूचना जारी हुई। संविधान के 103वें संशोधन के आधार पर कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग ने यह अधिसूचना जारी की। इसके जरिए नौकरी और शिक्षण संस्थानों में प्रवेश में आरक्षण दिया गया। इसका लाभ उन लोगों को मिलता है, जो SC, ST या OBC आरक्षण के दायरे में नहीं आते और जिनके परिवार की सकल वार्षिक आय आठ लाख से कम है। हालांकि, इसके साथ ही आरक्षण को लेकर कुछ शर्ते भी थीं।
ईडब्ल्यूएस सर्टिफिकेट के लिए वे लोग आवेदन कर सकते हैं, जिनकी सालाना पारिवारिक आमदनी 8 लाख रुपये या उससे कम है। इसमें स्रोतों में सिर्फ सैलरी ही नहीं, कृषि, व्यवसाय और अन्य पेशे से मिलने वाली आय भी शामिल हैं।
वहीं, अगर कोई व्यक्ति गांव में रहता है। ऐसे में उसके पास पांच एकड़ से कम आवासीय भूमि होनी चाहिए, साथ ही 200 वर्ग मीटर से अधिक आवासीय जमीन नहीं होनी चाहिए।
शहरों में रहने वाले लोगों के पास भी 200 वर्ग मीटर से अधिक आवासीय जमीन नहीं होनी चाहिए।
EWS के पात्र के पास आरक्षण का दावा करने के लिए 'आय और संपत्ति प्रमाण पत्र' होना जरूरी है। यह प्रमाण पत्र तहसीलदार या उससे ऊपर पद के राजपत्रित अधिकारी ही जारी करते हैं। इसकी वैधता एक साल तक ही रहती है।
अगर आप EWS सर्टिफिकेट के लिए आवेदन करने जा रहे हैं। ऐसे में आपके पास पहचान पत्र, राशन कार्ड, स्वयं घोषित प्रमाण पत्र, आधार कार्ड, आयु प्रमाण पत्र, जाति प्रमाण पत्र, आय प्रमाण पत्र, मूल निवास प्रमाण पत्र, मोबाइल नंबर, पैन कार्ड और दूसरे दस्तावेजों की जरूरत होगी।