फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

बजट - 2019 : आर्थिक चुनौतियों से लड़ने का दिव्यास्त्र नहीं 

Fri, 05 Jul 2019 11:41 PM IST
Avdhesh Kumar राजेश बादल 
विज्ञापन
बजट - फोटो : SELF
विज्ञापन
लोकसभा में एनडीए सरकार के दूसरे कार्य काल का पहला बजट बेशक उतना कठोर नहीं दिखता, जितना अर्थशास्त्री कयास लगा रहे थे। इसका आधार यही था कि आमतौर पर शुरुआती दो या तीन बजट में सरकारों का रुख तनिक कठोर होता रहा है। जैसे-जैसे चुनाव करीब आते हैं, अंतिम दो साल में यह पूरी तरह चुनावी हो जाता है। लेकिन इसका अर्थ नहीं है कि यह कोई लोक लुभावन बजट है। दरअसल यह एक सुहाने और सपनीले हिंदुस्तान का खाका खींचने वाला सुदर्शन आलेख है। 
विज्ञापन


हकीकत की पथरीली और सूखी - बंजर जमीन से टकराने वाला कोई दिव्यास्त्र नहीं। इसका अर्थ आप यह भी लगा सकते हैं कि जो वित्तीय चुनौतियां मुल्क के सामने विकराल रूप में खड़ी हैं, उनसे निपटने की कोई कार्ययोजना सचमुच केंद्र सरकार के पास नहीं है। अगर बहुत उदार होकर भी सोचा जाए तो यह माना जा सकता है कि कड़क बजट अगले साल के लिए मुल्तवी कर दिया गया है क्योंकि इस साल महाराष्ट्र और अन्य राज्यों के विधानसभा चुनाव सिर पर हैं, जिनमें विजय बीजेपी के लिए बेहद जरूरी है। हारने की सूरत में प्रचार - प्रसार माध्यमों के जरिए संदेश जाएगा कि लोक सभा चुनाव जीतने के बाद ही लोगों का मोहभंग होने लगा है।

इस बजट से जानकार और विवेकशील लोग 2025 तक पांच ट्रिलियन डॉलर अर्थ व्यवस्था की ऊंचाई तक पहुंचने के लिए उपायों की झलक चाहते थे। जीडीपी की मौजूदा दर नाकाफी है। आर्थिक सर्वेक्षण भी इस वित्त वर्ष में बमुश्किल 7 फीसदी हासिल करने का इशारा कर रहा है। अगले 5 साल लगातार 8 फीसदी की दर ही भारत को शिखर बिंदु तक ले जाएगी। यह बेहद मुश्किल दिखता है।
विज्ञापन
विज्ञापन

यह महसूस किया गया है कि भारत का बुनियादी ढांचा आमूलचूल बदलाव मांगता है। सिर्फ सरकारी निवेश सक्षम नहीं है। अनुमान है कि 200 अरब डॉलर सालाना निवेश चाहिए। हमारी अधिकतम क्षमता 100 अरब डॉलर की है। याने 100 अरब डॉलर का सालाना  अंतर पाटना फिलहाल दूर की कौड़ी है।

एक बड़ी स्थाई समस्या किसानों की बेहतरी है। ऐसा लगने लगा है कि अब यह नासूर बन चली है। कर्ज माफी और समर्थन मूल्य बढ़ाना या उन्हें खैरात में सम्मान निधि का लेबल चस्पा करके धन देना समाधान नहीं है। अफसोसनाक है कि इस मामले में दोनों गठबंधन तथा विद्वान नौकरशाह नाकाम रहे हैं। वे समझने को तैयार नहीं हैं कि गांधी के ग्राम स्वराज में इसका हल छुपा हुआ है। राष्ट्रपिता का दर्शन ही इस सिरदर्द का इलाज है।
 
इसी तरह बेरोजगारी से लड़ने की व्यूह रचना भी नदारद है। निजी क्षेत्रों के पूंजीनिवेश पर निर्भर रहते हुए आप जवान खून के आक्रोश का मुकाबला नहीं कर सकते, जो अब धीरे धीरे खतरनाक स्तर को छूने लगा है। देश की आबादी के मान से सरकारी तंत्र में खाली पड़े पद एक विराट और दानवीय हैं। व्यवस्था (एस्टेब्लिशमेंट) पर होने वाला खर्च बढ़ाने पर ही उन्हें भरा जा सकता है। यह तस्वीर का दूसरा पहलू है।

अंतिम बात रक्षा बजट की निरंतर उपेक्षा से संबंधित है। सन 2014 से ही इस पर ध्यान नहीं है। दो साल पहले रक्षा पर कुल जीडीपी का केवल 1.62 ही व्यय हो रहा था। यह 1962 के बाद से सबसे कम है। संसद की स्थायी समितियां रक्षा उपकरणों और उत्पादनों पर बीते पांच साल में चिंता प्रकट कर चुकी हैं। लेकिन हम क्यों इस पर ध्यान नहीं दे रहे हैं- समझ से परे है। सर्जिकल स्ट्राइक या एयर स्ट्राइक का कोई बजट प्लान नहीं कर सकते। यह तथ्य भी नहीं भूलना चाहिए।  
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें