लोकसभा में एनडीए सरकार के दूसरे कार्य काल का पहला बजट बेशक उतना कठोर नहीं दिखता, जितना अर्थशास्त्री कयास लगा रहे थे। इसका आधार यही था कि आमतौर पर शुरुआती दो या तीन बजट में सरकारों का रुख तनिक कठोर होता रहा है। जैसे-जैसे चुनाव करीब आते हैं, अंतिम दो साल में यह पूरी तरह चुनावी हो जाता है। लेकिन इसका अर्थ नहीं है कि यह कोई लोक लुभावन बजट है। दरअसल यह एक सुहाने और सपनीले हिंदुस्तान का खाका खींचने वाला सुदर्शन आलेख है।
हकीकत की पथरीली और सूखी - बंजर जमीन से टकराने वाला कोई दिव्यास्त्र नहीं। इसका अर्थ आप यह भी लगा सकते हैं कि जो वित्तीय चुनौतियां मुल्क के सामने विकराल रूप में खड़ी हैं, उनसे निपटने की कोई कार्ययोजना सचमुच केंद्र सरकार के पास नहीं है। अगर बहुत उदार होकर भी सोचा जाए तो यह माना जा सकता है कि कड़क बजट अगले साल के लिए मुल्तवी कर दिया गया है क्योंकि इस साल महाराष्ट्र और अन्य राज्यों के विधानसभा चुनाव सिर पर हैं, जिनमें विजय बीजेपी के लिए बेहद जरूरी है। हारने की सूरत में प्रचार - प्रसार माध्यमों के जरिए संदेश जाएगा कि लोक सभा चुनाव जीतने के बाद ही लोगों का मोहभंग होने लगा है।
इस बजट से जानकार और विवेकशील लोग 2025 तक पांच ट्रिलियन डॉलर अर्थ व्यवस्था की ऊंचाई तक पहुंचने के लिए उपायों की झलक चाहते थे। जीडीपी की मौजूदा दर नाकाफी है। आर्थिक सर्वेक्षण भी इस वित्त वर्ष में बमुश्किल 7 फीसदी हासिल करने का इशारा कर रहा है। अगले 5 साल लगातार 8 फीसदी की दर ही भारत को शिखर बिंदु तक ले जाएगी। यह बेहद मुश्किल दिखता है।