ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की बैठक में ईरान द्वारा यूएई पर अमेरिका और इस्राइल का साथ देने के आरोपों के बाद भारी तनाव पैदा हो गया है। यूएई ने भी ईरान पर मिसाइल हमलों का आरोप लगाया है। आपसी मतभेदों के कारण साझा घोषणापत्र जारी होना मुश्किल लग रहा है। चीन के विदेश मंत्री वांग यी, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दौरे के कारण बैठक में शामिल नहीं हुए। आइए, विस्तार से पूरे मामले को जानते हैं...
ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की बैठक के आखिरी दिन शुक्रवार को एक बड़ा कूटनीतिक संकट खड़ा हो गया है। बैठक के दौरान ईरान और यूएई के प्रतिनिधियों के बीच हुई तीखी नोकझोंक के कारण अब साझा घोषणापत्र जारी होने की उम्मीदें बहुत कम नजर आ रही हैं। जब से ब्रिक्स का विस्तार हुआ है, यह पहली बार है जब सदस्य देशों के बीच के आपसी झगड़े और क्षेत्रीय संघर्ष इस अंतरराष्ट्रीय मंच की एकता के लिए बड़ी चुनौती बन गए हैं। भारत की अध्यक्षता में हो रही इस बैठक में आपसी मतभेदों ने साझा सहमति की राह में दीवार खड़ी कर दी है।
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ईरान और यूएई के बीच विवाद की मुख्य वजह क्या है?
बैठक में तनाव तब चरम पर पहुंच गया जब ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने यूएई पर गंभीर आरोप लगाए। अराघची ने कहा कि यूएई, अमेरिका और इस्राइल के सैन्य अभियानों में सक्रिय रूप से शामिल होकर ईरान के खिलाफ काम कर रहा है। इसके जवाब में यूएई के प्रतिनिधि ने इन आरोपों का कड़ा विरोध किया और पलटवार करते हुए कहा कि ईरान ने अमेरिकी सैन्य ठिकानों की आड़ में यूएई पर लगातार मिसाइल हमले किए हैं। इस टकराव के कारण दोनों देश घोषणापत्र की भाषा को लेकर एक-दूसरे के खिलाफ खड़े हो गए हैं, जिससे आम सहमति बनना लगभग नामुमकिन दिख रहा है।
साझा घोषणापत्र को लेकर पेच कहां फंसा हुआ है?
साझा घोषणापत्र को लेकर विवाद इस बात पर है कि इसमें फलस्तीन, इस्राइल और अमेरिका के मुद्दे को किस तरह पेश किया जाए। ईरान चाहता है कि इस दस्तावेज में इस्राइल और अमेरिका के आक्रामक रुख की कड़ी निंदा की जाए। दूसरी ओर, यूएई और कुछ अन्य सदस्य देश ईरान की भूमिका को लेकर भी सख्त भाषा इस्तेमाल करने के पक्ष में हैं। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने कूटनीति और मेलजोल पर जोर दिया, लेकिन देशों की आपसी कड़वाहट इतनी बढ़ गई है कि अब घोषणापत्र की जगह केवल 'अध्यक्षीय सारांश' (चेयरमैन समरी) जारी होने की संभावना जताई जा रही है।
चीन के विदेश मंत्री वांग यी बैठक में क्यों शामिल नहीं हुए?
इस महत्वपूर्ण बैठक से चीन के विदेश मंत्री वांग यी नदारद रहे। उनकी जगह भारत में चीनी राजदूत शू फेई होंग ने चीन का प्रतिनिधित्व किया। चीनी विदेश मंत्रालय ने सफाई देते हुए कहा कि वांग यी इस समय अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दौरे की तैयारियों में व्यस्त हैं, इसलिए उनका भारत आना संभव नहीं था। हालांकि चीन ने यह भी कहा कि वह भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता का पूरा समर्थन करता है, लेकिन वांग यी की अनुपस्थिति ने कूटनीतिक गलियारों में कई चर्चाओं को जन्म दे दिया है।
ब्रिक्स की एकजुटता पर इस झगड़े का क्या असर पड़ेगा?
अगर यह बैठक बिना किसी साझा घोषणापत्र के समाप्त होती है, तो यह ब्रिक्स समूह की निर्णय लेने की क्षमता पर एक बड़ा सवालिया निशान लगा देगा। समूह के विस्तार के बाद उम्मीद थी कि यह वैश्विक स्तर पर एक मजबूत आवाज बनेगा, लेकिन ईरान और यूएई के बीच का यह द्विपक्षीय विवाद संगठन की आंतरिक कमजोरी को उजागर कर रहा है। आपसी गुटबाजी के कारण ब्रिक्स के मंच पर देशों का एक सुर में बोलना मुश्किल हो गया है, जो आने वाले समय में इस संगठन की साख के लिए एक बड़ी परीक्षा साबित हो सकता है।