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Alderman: एल्डरमैन पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश के क्या हैं मायने? उपराज्यपाल को हर बात में सलाह की जरूरत नहीं

अमित शर्मा
Updated Mon, 05 Aug 2024 01:53 PM IST

सार

250 पार्षदों वाले दिल्ली नगर निगम में एल्डरमैन की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण होती है। एल्डरमैन मेयर के चुनाव या किसी बिल को पास करने के दौरान वोट तो नहीं कर सकते, लेकिन ये जोनल कमेटियों में मतदान कर सकते हैं। नगर निगम की सबसे ताकतवर स्टैंडिंग कमेटी के चुनाव के लिए जोनल कमेटियों से ही सदस्य चुनकर आते हैं।
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दिल्ली एमसीडी में एल्डरमैन की भूमिका। - फोटो : अमर उजाला


सर्वोच्च न्यायालय के आदेश का क्या होगा असर

दिल्ली नगर निगम में उपराज्यपाल 10 एल्डरमैन की नियुक्ति कर सकते हैं। इन एल्डरमैन की भूमिका कुछ हद तक राज्यसभा के मनोनीत सांसद जैसी होती है। नगर निगम में शहरी मामलों के जानकार लोगों को नगर निगम प्रशासन में भागीदारी देने के लिए एल्डरमैन की व्यवस्था की गई थी। इन्हें नगर निगम के मेयर सहित महत्त्वपूर्ण बिलों में मतदान करने का अधिकार नहीं है। 


लेकिन नगर निगम के प्रशासन में सबसे महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली स्टैंडिंग कमेटी के सदस्य जोनल कमेटियों से चुनकर आते हैं। इन जोनल कमेटियों में एल्डरमैन को वोट करने का अधिकार होता है। इस तरह एल्डरमैन की भूमिका स्टैंडिंग कमेटी के सदस्य और चेयरमैन की नियुक्तियों के संदर्भ में महत्त्वपूर्ण होती है। यही कारण है कि भाजपा और आम आदमी पार्टी इन नियुक्तियों में अपना अधिकार बनाए रखना चाहती हैं।    


पिछले मेयर के चुनाव के समय ही उपराज्यपाल वीके सक्सेना ने 10 एल्डरमैन की नियुक्ति कर दी थी। BJP उन्हें मतदान का अधिकार भी दिलाने की कोशिश कर रही थी, जबकि AAP एल्डरमैन को पिछली परंपरा के अनुसार वोट डालने का अधिकार देने को तैयार नहीं थी। अंततः यह विवाद सर्वोच्च न्यायालय की चौखट पर पहुंच गया था, जिसमें अदालत ने एल्डरमैन को नगर निगम के सदन में वोटिंग का अधिकार देने से मना कर दिया था।




एल्डरमैन के अधिकार का मामला सुलझ जाने के बाद भी यह बात बची रह गई थी कि एल्डरमैन की नियुक्ति करने का अधिकार किसके पास है। सर्वोच्च न्यायालय ने इस मुद्दे पर दोनों पक्षों के विचार सुने हैं। दिल्ली के उपराज्यपाल कार्यालय ने कहा है कि अनुच्छेद 239AA के अंतर्गत नए प्रावधानों के अनुसार अब उन्हें एल्डरमैन की नियुक्ति का अधिकार है। 


जबकि आम आदमी पार्टी सरकार का कहना है कि वह लोकतांत्रिक प्रक्रिया से चुनी हुई सरकार है, इसलिए एल्डरमैन की नियुक्ति का अधिकार उसके हाथ में होना चाहिए। सर्वोच्च न्यायालय के आज के निर्णय से यह साफ हो गया है कि वर्तमान एल्डरमैन अपने पद पर बने रह सकते हैं। यदि यह अधिकार दिल्ली की चुनी हुई सरकार के पास चला जाता तो उपराज्यपाल द्वारा बनाये गए वर्तमान 10 एल्डरमैन का भविष्य खतरे में पड़ सकता था। 


क्या पड़ेगा असर?

चूंकि, दिल्ली में अधिकारों को लेकर उपराज्यपाल और दिल्ली सरकार के बीच तनातनी लगातार चलती रही है, आज के आदेश के बाद यह कुछ अन्य मामलों पर भी असर डाल सकता है। सर्वोच्च न्यायालय ने दिल्ली सरकार को पुलिस और जमीन को छोड़कर प्रशासनिक मामलों में सीधे अधिकार दे रखे हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि उपराज्यपाल दिल्ली सरकार के प्रशासनिक कार्य को अनावश्यक लंबे समय तक रोक नहीं सकते हैं।  
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दिल्ली सरकार का आरोप रहा है कि उपराज्यपाल नियुक्तियों और सेवाओं सहित मंत्रालयों के कार्यों में भी अनावश्यक हस्तक्षेप करते रहते हैं। आज जिस तरह सर्वोच्च न्यायालय ने एल्डरमैन मामले में उपराज्यपाल के अधिकारों को स्वीकार किया है, इस निर्णय का असर अन्य मामलों पर भी पड़ सकता है और यह लड़ाई कुछ अन्य मामलों में भी देखने को मिल सकती है। 


आम आदमी पार्टी ने क्या कहा?

आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद संजय सिंह ने कहा है कि सर्वोच्च न्यायालय का यह निर्णय उनकी अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं रहा है। कोर्ट की सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय के रुख से उन्हें यह उम्मीद थी कि निर्णय उनके पक्ष में जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। उन्होंने कहा कि यदि ऐसा है तो दिल्ली में एक चुनी हुई सरकार होने का क्या अर्थ है। उन्होंने कहा कि वे सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय की पूरी जानकारी करने के बाद ही आम आदमी पार्टी इस पर कोई निर्णय लेगी। दरअसल, सरकार के पास इस निर्णय की पुनर्समीक्षा में जाने का अधिकार है। 


सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय केजरीवाल सरकार के मुंह पर तमाचा- भाजपा

वहीं, भाजपा ने सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय का स्वागत किया है। भाजपा नेता विजेंद्र गुप्ता ने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय का आज का निर्णय आम आदमी पार्टी सरकार के मुंह पर एक तमाचे जैसा है। उन्होंने कहा कि यह सभी जानते थे कि एल्डरमैन की नियुक्तियों के संदर्भ में उपराज्यपाल के पास स्वविवेक का अधिकार होता है, लेकिन केजरीवाल सरकार ने जानबूझकर इस मामले को कोर्ट की कार्रवाई में उलझाया और इसके बहाने 15 महीने से स्टैंडिंग कमेटी की नियुक्ति नहीं होने दी। उन्होंने कहा कि इसके बहाने दिल्ली के कामकाज रोके जा रहे हैं और जनता केजरीवाल को इसकी सजा अवश्य देगी।
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