यूपी के सियासी समर को अब करीब साल भर ही रह गया। प्रमुख सियासी दलों ने यूपी का मैदान मारने के लिए अभी से जोर-आजमाइश शुरू कर दी है। कांग्रेस पीके (प्रशांत किशोर) के सहारे अपनी खोई जमीन वापस लौटने की उम्मीद में है तो सपा और बसपा को अपने-अपने कैडर वोट बैंक का भरोसा है।
जिस प्रदेश के बलबूते बीजेपी को केंद्र की सत्ता मिली, वहां की मुख्यमंत्री की कुर्सी भी पार्टी के लिए नाक और साख का सवाल बन गई है।
केशव प्रसाद मौर्य को प्रदेशाध्यक्ष बनाकर एक तरफ बीजेपी ने पिछड़ा वोट बैंक साधने की कोशिश की है तो राष्ट्रीय अध्यक्ष ने दलित से लेकर बूथ और यूथ को पार्टी से जोड़ने की मुहिम शुरू की है। असम में सर्वानंद सोनोवाल की सफलता के बाद यूपी में भी बीजेपी किसी ऐसे चेहरे की तलाश में है जिस के सहारे लोकसभा की जीत पर मुहर लगाई जा सके।