"पानी ईश्वर का दिया उपहार है। हमें इस उपहार को संरक्षित करने की जरूरत है। 'हर बूंद पर ज्यादा फसल' हमारा ध्येय वाक्य होना चाहिए, ताकि किसानों को पानी बचाने के प्रति जागरूक बनाया जा सके।" खेती और किसान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषणों में आम तौर पर शामिल होते हैं। सत्ता में आने के तकरीबन ढाई महीने बाद उन्होंने इंडियन काउंसिल ऑफ एग्रिकल्चर रिसर्च के एक पुरस्कार समारोह में किसानों को 'हर बूंद पर ज्यादा फसल' उगाने का मंत्र दिया था। राष्ट्रीय क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के मुताबिक, उसी वर्ष 5,650 किसानों ने आत्महत्या की थी।
मोदी सरकार अगले महीने सत्ता के शीर्ष पर दो वर्ष पूरे कर लेगी। अच्छे दिनों का वादा आम आबादी के लिए 'भरम' ही रहा है, जबकि किसानों की हालत बदतर हो गई। मराठवाड़ा और बुंदेलखंड से आ रही सूखे की आहट से किसान और सहमे हैं। सवाल उठने लगा है कि उन वादों और इरादों का क्या हुआ, जिनका यकीन बीजेपी ने लोकसभा चुनावों के लिए जारी किए गए अपने घोषणा पत्र में दिलाया था। किसानों के लिए पार्टी ने कई घोषणाएं की थी, उनमें से कितनों पर अमल हुआ। कहां रह गए किसानों के अच्छे दिन?
कृषि लागत पर 50 फीसदी लाभ के वादे से पलटी मोदी सरकार
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लोकसभा चुनावों के लिए 2014 में जारी घोषणापत्र में भारतीय जनता पार्टी ने ग्रामीण विकास और कृषि क्षेत्र में सर्वाजनिक निवेश बढ़ाने का वादा किया। पार्टी का वादा था कि किसानों को कृषि लागत पर कम से कम 50 फीसदी लाभ उपलब्ध कराना सुनिश्चित कराया जाएगा और खेती में लाभ बढ़ाया जाएगा। सस्ते कृषि सामान, कर्ज उपलब्ध कराए जाएंगे, कृषि में नई तकनीकी और उच्च उत्पादकता वाले बीज उपलब्ध कराए जाएंगे और मनरेगा को खेती से जोड़ा जाएगा।
कृषि लागत पर कम से कम 50 फीसदी लाभ उपलब्ध कराना ऐसा वादा था, जिसने किसानों में वाकई 'अच्छे दिनों' की उम्मीद जगा दी थी। हालांकि हकीकत उम्मीद से परे रही। सरकार ने 2015-16 के लिए गेहूं और धान के न्यूनतम समर्थन मूल्य में महज 50 रुपए की बढ़ोतरी की। सुप्रीम कोर्ट में बीजेपी के घोषणपत्र पर अमल कराने के लिए एक याचिका डाली गई। याचिका में कृषि लागत पर कम से कम 50 फीसदी लाभ उपलब्ध कराने की मांग की गई। पिछले साल फरवरी में सुप्रीम कोर्ट में याचिका के जवाब में दायल हलफनामे में मोदी सरकार ने कहा कि कृषि लागत पर 50 फीसदी लाभ उपलब्ध कराना संभव नहीं है, क्योंकि इससे बाजार पर बुरा प्रभाव पड़ेगा।
हालात तब और बदतर हो गए, जब केंद्र सरकार ने राज्य सरकारों को भी न्यूनतम समर्थन मूल्य से ऊपर या अधिक बोनस देने से मना कर दिया। कई रिपोर्टों में ये भी दावा किया गया कि केंद्र ने फूड कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया को आदेश दिया कि वो न्यूनतम समर्थन मूल्य पर बोनस देने वाले राज्यों से गेहूं या चावल न खरीदें। केंद के फैसले से सबसे ज्यादा झटका बीजेपी शासित राज्यों के किसानों को ही लगा।
मोदी ने इसी साल 'प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना' लांच की
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भाजपा ने अपने घोषणापत्र में 60 साल से बूढ़े किसानों, छोटे और सीमांत किसानों और कृषि मजदूरों के लिए कल्याणकारी कदम उठाने का वादा किया। सिंचाई की ऐसी तकनीकी उपलब्ध कराने का वादा किया गया, जिनसे पानी का उपभोग कम हो और उपयोग अधिकतम हो सके। मिट्टी की जांच करने के लिए मोबाइल सॉइल टेस्टिंग लैब्स का वादा किया गया। खेती को लाभकारी बनाने के लिए फूड प्रोसेसिंग इंडस्ट्री खोलने की बात की गई और ऐसी इंडस्ट्री खोलने पर किसानों को प्रोत्साहन राशि देने का भी वादा किया गया।
मोदी सरकार ने पिछले साल मिट्टी की परीक्षण की दिशा में ठोस पहलकदमी की। सरकार ने डिजिटल सॉइल किट लॉन्च किया, जिसका नाम मृदा परीक्षक था। इस किट के जरिए खेत की मिट्टी की सेहत की जांच की जा सकती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किसानों को अपने खेतो की मिट्टी की उर्वरता को समझने के लिए सॉइल हेल्थ कार्ड स्कीम लॉन्च की। केंद्र सरकार का दावा है कि योजना के तहत देश के सभी 14.5 करोड़ किसानों को अगले तीन सालों में सॉइल हेल्थ कार्ड उपलब्ध कराया जाएगा। सरकार ने अपने पहले ही बजट में सॉइल टेस्टिंग लैब बनाने के लिए धन की व्यवस्था की।
भाजपा ने अपने घोषणा पत्र में कृषि बीमा का वादा किया था। मोदी सरकार ने इसी साल 'प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना' लांच की है, जिसमें बहुत ही न्यूनतम प्रीमियम पर फसले के बीमे का वादा किया गया है। हालांकि फसलों की बर्बादी और उसके बाद किसानों की आत्महत्या के सिलसिले पर योजना लगाम लगा पाएगी कि नहीं, ये वक्त के गर्भ में है। भारत में आत्महत्या करने वाले किसानों में 16.81 फीसदी किसान फसलों की बर्बादी के कारण आत्महत्या कर रहे हैं।