अपने ही नेताओं की तरफ से पश्चिम बंगाल के बंटवारे का मुद्दा उठाए जाने से भाजपा की मुश्किलें बढ़ गई हैं। केंद्रीय नेताओं की तरफ से खारिज करने के बावजूद उत्तर बंगाल और दक्षिण बंगाल के भाजपा सांसद लगातार राज्य को दो हिस्सों में बांटे जाने की मांग कर रहे हैं।
राज्य में सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस ने भाजपा पर इसके जरिये बंगाली अस्मिता को बांटने का आरोप लगाया है। वहीं उत्तरी बंगाल को अलग राज्य बनाने की मांग लेकर पहले से ही आंदोलन कर रहे विभिन्न जातीय समूहों ने भी भाजपा की आलोचना की है। इससे राज्य में भाजपा के सामने जनसमर्थन खोने का संकट खड़ा हो गया है।
दरअसल अलीपुरद्वार से भाजपा सांसद जॉन बरला, सांसद जयंत रॉय और कूच बिहार के सांसद निशित प्रमाणिक ने उत्तर बंगाल से चुने गए भाजपा विधायकों के साथ मिलकर एक अलग समिति बना ली है, जिसने सोमवार को उत्तर बंगाल को एक अलग राज्य का दर्जा दिए जाने का एक प्रस्ताव पारित किया है। इससे नाराज होकर अलीपुरद्वार के भाजपा जिला अध्यक्ष गंगा प्रसाद शर्मा के नेतृत्व में पूरी जिला इकाई तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो गई है, जबकि हालिया चुनाव में अलीपुरद्वार जिले की सभी पांचों विधानसभा सीटें भाजपा ने जीती थीं। बता दें कि बरला खुद पहले उत्तरी बंगाल के आदिवासी क्षेत्र को स्वायत्त घोषित किए जाने की मांग वाले आंदोलन का नेतृत्व कर चुके हैं।
अपने सांसदों की इस कवायद से हुए राजनीतिक नुकसान की भरपाई के प्रयास में भाजपा की राज्य इकाई और केंद्रीय नेताओं ने बंटवारे की बात सिरे से नकार दी है। प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष ने स्पष्ट कहा है कि यह पार्टी की नहीं बल्कि बरला की निजी राय है। भाजपा कभी भी बंगाल के बंटवारे के पक्ष में नहीं रही है। हम पूरे पश्चिम बंगाल का विकास चाहते हैं। लेकिन प्रदेश अध्यक्ष के इस बयान के बाद भाजपा जनता युवा मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष और विष्णुपुर से लोकसभा सांसद सौमित्र खान ने भी दक्षिणी बंगाल के जंगलमहल क्षेत्र को अलग राज्य का दर्जा दिए जाने की मांग उठा दी है।
उनका कहना है कि जंगलमहल क्षेत्र में बड़ी संख्या में रोहिंग्या शरणार्थियों को बसाया जा रहा है। इससे बहुत जल्दी ही बंगाल के मूल निवासी अपने ही घर में अल्पसंख्यक बनकर रह जाएंगे। इसीलिए इस क्षेत्र को अलग राज्य बनाया जाना चाहिए। उन्होंने दक्षिण बंगाल की बीरभूम, बर्दवान, आसनसोल, पुरुलिया, बांकुरा, विष्णुपुर, झारग्राम पूर्व और पश्चिमी मिदनापुर और हुगली के कुछ क्षेत्रों को इस नए राज्य में मिलाने की मांग की है।
लेकिन भाजपा सांसदों की मांग को गोरखा जनमुक्ति मोर्चा (जीजेएम), ग्रेटर कूच बिहार पीपुल्स एसोसिएशन (जीसीपीए) व कामतापुर आंदोलन से जुड़े अन्य जातीय समूहों ने ‘अव्यवहारिक’ और ‘प्रतिशोधी’ करार दिया है। इन सभी का कहना है कि भाजपा 2024 में अगले लोकसभा चुनाव से पहले राज्य को अशांत करने का प्रयास कर रही है।
जातीय समूहों ने कहा
एक केंद्र शासित प्रदेश या एक अलग राज्य जिसमें सभी उत्तर बंगाल जिले शामिल हैं, क्या उद्देश्य पूरा करेगा? हम अलग गोरखालैंड राज्य चाहते हैं। हम इसके लिए 1980 से लड़ रहे हैं। हम भाजपा पर यकीन नहीं करते, जो हमें 2009 से बेवकूफ बना रही है।
- रोशन गिरि, महासचिव, जीजेएम
अलग केंद्रशासित प्रदेश राजबंशियों के लिए एक स्वतंत्र राज्य की मांग के समान नहीं है, जो राज्य में अनुसूचित जाति आबादी का सबसे बड़ा हिस्सा हैं। स्वतंत्रता के समय कूचबिहार रियासत को सी-श्रेणी का राज्य बनाए जाने के वादे के साथ भारत में विलय किया गया था। लेकिन वह वादा पूरा नहीं हुआ और रियासत को असम और पश्चिम बंगाल के बीच बांट दिया गया। इसलिए उत्तर बंगाल को एक राज्य या केंद्र शासित प्रदेश बनाने से बहुत मदद नहीं मिलेगी।
- बंगशी बदन बर्मन, जीसीपीए नेता
यह मांग अव्यववहारिक और विधानसभा चुनावों की हार के बाद स्कोर बराबर करने जैसा प्रयास है। उत्तरी बंगाल में लोगों की आवश्यकताएं हर जिले में अलग हैं। हम एक केंद्रशासित प्रदेश की इस अपील का समर्थन नहीं करेंगे। हम कामतापुरियों के लिए अलग राज्य चाहते हैं।
- निखिल रॉय, अध्यक्ष, कामतापुर पीपुल्स पार्टी
राजनीतिक विश्लेषक विश्वनाथ चक्रवर्ती ने कहा कि 'टीएमसी और भाजपा क्षेत्र में अलग राज्य की मांग पर दोहरे मापदंड अपनाते रहे हैं। इस बार भाजपा गलत छोर पर है और जॉन बरला की केंद्रशासित प्रदेश की मांग पार्टी को राजनीतिक और वोट, दोनों लिहाज से नुकसान पहुंचाएगी।'
बेहद अहम है उत्तरी बंगाल
राज्य के लिए:- दार्जिलिंग समेत आठ जिलों वाला उत्तरी बंगाल विश्व स्तरीय चाय बागानों, कीमती इमारती लकड़ी वाले घने वनों और बड़े पैमाने पर पर्यटकों को लुभाने वाले स्थानों का घर है। इसके चलते बंगाल राज्य की आय का अहम स्रोत है।
देश के लिए:- तीन देशों नेपाल, भूटान और बांग्लादेश की सीमाएं उत्तरी बंगाल से जुड़ी हैं। उत्तर-पूर्वी राज्यों को बाकी देश से जोड़ने वाला और चीन सीमा तक सेना को पहुंच देने वाला मशहूर ‘चिकन नेक’ सिलीगुड़ी कॉरिडोर भी इसी हिस्से में है मौजूद।
भाजपा की बड़ी ताकत
उत्तरी बंगाल के विभिन्न जातीय समूह गोरखा, राजबंशी, कोच व कामतापुरी आदि भाजपा की बड़ी ताकत रहे हैं। आठ लोकसभा सीटों वाले इस क्षेत्र से 2019 के आम चुनावों में भाजपा के सात सांसद जीते थे। हालांकि इस साल विधानसभा चुनावों में इस क्षेत्र ने दोबारा तृणमूल कांग्रेस की तरफ झुकाव दिखाया है। जॉन बरला के विवादित बयान को भी टीएमसी की इसी सफलता से जोड़कर 2024 के लोकसभा चुनावों से पहले माहौल गरमाने की कोशिश वाला माना जा रहा है।
अलग राज्य को लेकर होते रहे हैं यहां आंदोलन
- 1980 में पहली बार उत्तरी बंगाल को गोरखालैंड घोषित करने का आंदोलन हुआ
- 1986 में सुभाष घीसिंग के जीएनएल ने हिंसक विद्रोह की शुरुआत की
- 43 दिन तक चले इस आंदोलन के दौरान सैकड़ों लोगों की जान गई
- 1988 में दार्जिलिंग गोरखा हिल परिषद इस हिंसक आंदोलन के कारण गठित
- 2011 में जीजेएम सुप्रीमो बिमल गुरूंग को गोरखालैंड प्रादेशिक प्रशासन का प्रमुख बनाया गया
- 2013 में गुरूंग ने ही टीएमसी से हटकर अलग गोरखालैंड के समर्थन में आंदोलन छेड़ दिया
- 2017 में टीएमसी पर गोरखा पहचान को मिटाने का आरोप लगाकर 104 दिन तक हड़ताल की गई