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यूपी में BJP सरकार बनी तो ये होंगे CM पद के दावेदार

Tue, 24 Jan 2017 02:51 PM IST
विनोद अग्निहोत्री / नई दिल्ली
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उत्तरप्रदेश के विधानसभा चुनाव में भाजपा किसी भी नेता को भावी मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित नहीं करेगी। उनकी योजना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नीतियों और नेतृत्व के नाम पर ही वोट मांगने की है। हालांकि मोदी और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह के बाद प्रदेश भाजपा अध्यक्ष केशवदेव मौर्य को चुनाव प्रचार में सबसे ज्यादा तरजीह देकर धीरे धीरे उन्हें स्वाभाविक दावेदार के रूप में स्थापित करने पर भी विचार किया जा रहा है।
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अगर चुनाव बाद भाजपा सरकार बनने की स्थिति आती है तो मुख्यमंत्री पद के लिए मौर्य ही भाजपा की पहली पसंद होंगे। पार्टी की इस रणनीति को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भी हरी झंडी दे दी है।
प्रमुख भाजपा नेता ने बताया कि उत्तर प्रदेश के भाजपा नेताओं में मुख्यमंत्री पद केप्रमुख दावेदारों में जहां पहले केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी, मनोज सिन्हा, डा. महेश शर्मा, पार्टी प्रदेश अध्यक्ष केशवदेव मौर्य, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष डा. दिनेश शर्मा और सांसद योगी आदित्यनाथ तक केनामों की चर्चा चलती रही।
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बताया जाता है कि मनोज सिन्हा और दिनेश शर्मा को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का बेहद भरोसा प्राप्त है, वहीं संघ नेतृत्व का झुकाव योगी आदित्यनाथ के पक्ष में था। जबकि प्रदेश के जातीय गणित और सामाजिक समीकरणों को देखते हुए अमित शाह केशवदेव मौर्य को सबसे ज्यादा मुफीद मानते हैं

और उन्होंने प्रधानमंत्री और संघ नेतृत्व को भी अपने तर्कों से इसके लिए राजी कर लिया है कि चुनाव से पहले किसी को मुख्यमंत्री के चेहरे केरूप में पेश करने की बजाय मोदी केचेहरे और लोकप्रियता पर ही चुनाव लड़ा जाए। 

इस भाजपा नेता केमुताबिक साथ ही रणनीति यह बनी है कि चुनाव प्रचार में मोदी और शाह केबाद सबसे ज्यादा तरजीह केशवदेव मौर्य को देते हुए राज्य के गैर यादव पिछड़े और अति पिछड़े मतदाताओं के बीच यह संदेश दिया जाए कि अगर उन्होंने भाजपा को वोट देकर उसकी सरकार बनवाई तो मौर्य ही लखनऊ में मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठ सकते हैं।
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गणित है कि कांग्रेस के शीला दीक्षित को आगे लाकर खेले गए ब्राह्मण कार्ड के विफल होने के बाद राज्य के करीब 26 फीसदी सवर्ण जनाधार के सामने कोई दूसरा विकल्प नहीं है, जबकि 40 फीसदी गैर यादव पिछड़े और अति पिछड़े मतदाताओं के सामने भाजपा केअलावा बसपा और सपा के विकल्प हैं। 

लेकिन सपा केझगडे और बसपा में दलित नेतृत्व की वजह से यह वर्ग भाजपा की तरफ आ सकता है बशर्ते उसे भरोसा हो जाए कि पार्टी चुनाव जीतने के बाद सत्ता की कमान किसी पिछड़े नेता को ही सौंपेगी। इसलिए अगर केशवदेव मौर्य को चुनाव में अन्य नेताओं से ज्यादा तरजीह दी जाएगी तो पिछडों और अति पिछड़ों को भाजपा के साथ जोडऩे में आसानी होगी और सवर्ण मतदाताओं केसाथ इनके ध्रुवीकरण से न सिर्फ भाजपा की जीत का रास्ता साफ होगा बल्कि संघ के हिंदू ध्रुवीकरण की राजनीति को भी बल मिलेगा।
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