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उत्तर प्रदेश में सीएम चेहरे पर भाजपा संघ में सहमति नहीं

Wed, 28 Sep 2016 05:30 AM IST
विनोद अग्निहोत्री/ अमर उजाला, नई दिल्ली
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- फोटो : amar ujala
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उत्तर प्रदेश में भाजपा मुख्यमंत्री के उम्मीदवार के रूप में किसे उतारे इसे लेकर पार्टी की मातृ संस्था एवं वैचारिक प्रेरणा की गंगोत्री राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बीच सहमति नहीं बन पा रही है। इस मामले में अंतिम फैसला नवरात्रि के बाद अक्टूबर में हो सकता है। यह जानकारी देने वाले संघ सूत्रों का कहना है कि भाजपा नेतृत्व का एक प्रभावशाली हिस्सा केंद्रीय राज्य मंत्री अनुप्रिया पटेल को भाजपा में शामिल करके उन्हें मुख्यमंत्री का चेहरा बनाने की सोच रहा है जबकि संघ अभी इससे सहमत नहीं है।
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संघ अपनी शाखा से आए किसी कार्यकर्ता को आगे लाने केपक्ष में है। वह उत्तर प्रदेश में दिल्ली वाला प्रयोग करने का जोखिम लेने के पक्ष में नहीं है। दूसरा नाम सांसद योगी आदित्यनाथ का भी है। जिनकी उग्र हिंदुत्ववादी छवि संघ और उसके अनुषांगिक संगठनों को बेहद रास आती है। लेकिन भाजपा नेतृत्व का उदारवादी धड़ा आदित्यनाथ के नाम को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी केसुशासन और विकास के नारे केअनुकूल नहीं मानता है।इनके अलावा केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी, महेश शर्मा, पार्टी उपाध्यक्ष दिनेश शर्मा,सांसद वरुण गांधी के नाम भी चलते रहे हैं।

भाजपा केएक वरिष्ठ नेता का कहना है कि अगर किसी भी नाम पर सहमति नहीं बनी तो आखिर में भाजपा नेतृत्व, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और संघ नेतृत्व केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह से आग्रह करके उन्हें उत्तर प्रदेश में पार्टी का खेवनहार बना सकता है। उत्तर प्रदेश को लेकर संघ और भाजपा के भीतर जारी मंथन और ङ्क्षचतन में यह बात उभर कर  आ रही है कि जहां सपा और बसपा में मुख्यमंत्री के चेहरे पहले से ही सामने हैं, वहींं कांग्रेस ने भी शीला दीक्षित को उतार कर दबाव बढ़ा दिया है। जबकि पहले भाजपा बिना किसी को मुख्यमंत्री का चेहरा बनाए ही चुनाव मैंदान में उतरने की तैयारी कर रही थी।
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ही आगे करके चुनाव लड़ना चाहेगी बीजेपी

- फोटो : Getty Images
संघ सूत्रों का कहना है कि उत्तर प्रदेश की चुनावी रणनीति को लेकर इन दिनों संघ नेताओं और भाजपा नेतृत्व के बीच कई बार गहन चर्चा हो चुकी है। सबसे बड़ी दुविधा लोकसभा को सर्वाधिक सांसद देने वाले इस राज्य के अगले विधानसभा चुनावों में मुख्यमंत्री केउम्मीदवार को लेकर है। भाजपा को इस मामले में दो तरह का अनुभव है। 2014 केलोकसभा चुनावोंं के बाद हुए महाराष्ट्र, हरियाणा, झारखंड और जम्मू कश्मीर विधानसभा चुनावों में बिना कोई चेहरा दिए पार्टी को जबर्दस्त सफलता मिली।

तीन राज्यों में उसकी सरकार है जबकि जम्मू कश्मीर में पीडीपी सरकार केसाथ वह साझीदार है। वहीं दिल्ली में किरण बेदी को मुख्यमंत्री उम्मीदवार के रूप में उतारने और बिहार में किसी को भी मुख्यमंत्री का चेहरा न बनाने केबावजूद दोनों जगह भाजपा को करारी मात खानी पड़ी। लेकिन असम में सर्वानंद सोनोवाल को बतौर मुख्यमंत्री उम्मीदवार पेश करने का फायदा भाजपा को हुआ और उसकी सरकार वहां बनी।
इस तरह के मिश्रित नतीजों की वजह से भाजपा उत्तर प्रदेश को लेकर यह तय नहीं कर पा रही है कि वह यहां अपने किसी नेता को भावी मुख्यमंत्री का चेहरा बनाकर मैदान में उतरे या सिर्फ पार्टी केसर्वाधिक करिश्माई नेता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ही आगे करके चुनाव लड़े।  

दरअसल कांग्रेस के ब्राह्मण कार्ड ने भाजपा की दुविधा बढ़ा दी है। अगर कांग्रेस इतने आक्रामक तरीके से चुनाव मैदान में नहीं उतरती तो भाजपा के लिए कोई समस्या नहीं थी, लेकिन कांग्रेस ने शीला दीक्षित को उतारकर भाजपा के मूल सवर्ण जनाधार में सेंध लगाने की जो चुनौती पेश की है, भाजपा उसकी काट खोज रही है।भाजपा केएक वरिष्ठ नेता के मुताबिक अध्यक्ष अमित शाह गैर यादव पिछड़ों और अति पिछड़ी जातियों का ध्रुवीकरण करके उन्हें सवर्णों के साथ जोडक़र भाजपा की जीत का जातीय समीकरण तैयार करना चाहते हैं,जबकि संघ नेता चाहता है कि भाजपा आक्रामक हिंदुत्व की राजनीति के जरिए हिंदू ध्रुवीकरण का अपना कार्ड खेले। 
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अनुप्रिया पटेल पर चर्चा हो सकती है !

अनु‌‌प्रिया पटेल
इसलिए संघ में योगी आद्तियनाथ के नाम पर मंथन है। संघ का तर्क है कि पूर्वांचल में आदित्यनाथ का अपना जनाधार है। फिर उनका भगवा वेश और आक्रामक हिंदुत्ववादी चेहरे की पहचान पूरे उत्तर प्रदेश मेंं है और सवर्ण होने केकारण उनकी स्वीर्कायता पूरे हिंदू समाज में है। लेकिन शाह और भाजपा केअन्य नेता कोईरी, कुर्मी, लोध, निषाद, मौर्य आदि गैर यादव पिछड़ी जातियों की मजबूत गोलबंदी भाजपा केपक्ष में करना चाहते हैं। केशव प्रसाद मौर्य को प्रदेश अध्यक्ष और बसपा से स्वामी प्रसाद मौर्य को भाजपा में लाकर पार्टी नेतृत्व ने इस दिशा मेंं ठोस कदम बढ़ाया है। इसी रणनीति केतहत प्रदेश की राजनीति में आक्रामक कुर्मी नेता रहे सोनेलाल पटेल की बेटी सांसद अनुप्रिया पटेल को केंद्रीय राज्य मंत्री बनाया गया है।
 
अनुप्रिया को उनकी मां अपना दल से निकाल चुकी हैं। अनुप्रिया हालाकि अभी औपचारिक रूप से भाजपा में नहीं हैं, लेकिन भाजपा नेताओं के साथ उनकी खासी निकटता है। भाजपा उनके जरिए राज्य केकरीब नौ फीसदी कुर्मी वोटों को अपने साथ जोडऩा चाहती है। इसलिए तर्क दिया जा रहा है कि अनुप्रिया जैसी युवा और शिक्षित महिला कुमी नेता को अगर मुख्यमंत्री का चेहरा बना दिया जाए तो कुर्मी, कोईरी, मौर्य, निषाद, लोध आदि जातियों का मजबूत समीकरण भाजपा के पक्ष में बन जाएगा। साथ ही इसका संदेश गुजरात मेंं भाजपा से नाराज पटेल समुदाय केबीच भी सकारात्मक जाएगा, क्योंकि गुजरात केपटेल और उत्तर भारत केकुर्मी अपने को एक ही समुदाय का मानते हैं।

अनुप्रिया प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी के पड़ोसी की चंदौली लोकसभा सीट से सांसद हैं, इसलिए पूर्वांचल में भी इसका अच्छा असर होने की उम्मीद है, जबकि पश्चिम मेंं भाजपा को अपने ङ्क्षहदू ध्रुवीकरण कार्ड का पूरा भरोसा है। तर्क यह भी है कि कांग्रेस कितना भी ब्राह्मण कार्ड खेले, लेकिन ब्राह्मण और दूसरे सवर्ण कांग्रेस केसाथ जाकर बसपा की जीत का रास्ता साफ नहीं करेंगे। इसलिए उनका समर्थन तो भाजपा को मिलने की गारंटी है। इसलिए गैर यादव पिछड़ों और सवर्णों केएक मुश्त वोट लेकर भाजपा बहुमत केलायक 200 विधानसभा सीटें जीतने का लक्ष्य आसानी से पा सकती है, क्योंकि मुस्लिम वोटों का बंटवारा सपा, बसपा और कांग्रेस के बीच होने से पार्टी का रास्ता और आसान हो जाएगा। फिलहाल भाजपा और संघ नेतृत्व मेंं इन दोनों धारणाओं केबीच रस्साकसी है। 
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