आचार्य रजनीश चंद्र मोहन 'ओशो' ने अपने विचारों के आधार पर एक अलग दुनिया गढ़ी। मुक्त सेक्स को लेकर ओशो की विचारधारा पर हमेशा सवाल ही उठते रहे। उन्होंने सेक्स को समाधि का रास्ता बताया। उनकी विचारधारा समाज को चुनौती देती है। जो लोग ओशो के बारे में ज्यादा नहीं जानते उनके लिए ओशो का नाम दुनियाभर के प्रसिद्ध बाबाओं और गुरुओं में से ही एक हैं। उनके लिए ओशो की पहचान एक ऐसी विवादित शख्सियत की है, जिन्होंने हमेशा बेरोकटोक जीवन और मुक्त सेक्स जैसी बातों का समर्थन किया। आज उनके जन्मदिन के मौके पर आपको जरूर जानना चाहिए कि ओशो की आखिर संभोग (सेक्स) को लेकर क्या विचाधारा थी। ओशो ने सेक्स को ही समाधि तक पहुंचने की सीढ़ी बता दिया।
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'सेक्स से ज्यादा महत्वपूर्ण कुछ नहीं है'
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ओशो कहते हैं कि प्रेम का प्राथमिक बिंदु सेक्स ही है और जो लोग सेक्स को घृणा के नजरिए से देखते हैं, वे कभी प्रेम कर ही नहीं सकते। ओशो के मुताबिक संभोग और समाधि के बीच एक सेतु है, एक यात्रा है, एक मार्ग है। समाधि जिसका अंतिम छोर है और संभोग उस सीढ़ी का पहला सोपान है।
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'प्रेम की सारी यात्रा का प्राथमिक बिंदु सेक्स है'
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ओशो ने कहा है कि हमने सेक्स को सिवाय गाली के आज तक दूसरा कोई सम्मान नहीं दिया। हम सेक्स की बात करते वक्त भी भयभीत होते हैं। लेकिन सच तो ये है कि मनुष्य के जीवन में इससे ज्यादा महत्वपूर्ण कुछ है ही नहीं।
हजारों साल से पीढ़ियां सेक्स से भयभीत रही हैं
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ओशो समाज के युवाओं को सेक्स के संबंध में चेताते हुए कहते हैं कि हजारों साल से पीढ़ियां सेक्स से भयभीत रही हैं। तुम भयभीत मत रहना। तुम समझने की कोशिश करना उसे। तुम बात करना। तुम सेक्स के संबंध में जो आधुनिक खोजे हुई हैं उनके बारे में पढ़ना। चर्चा करना और समझने की कोशिश करना।
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ओशो सेक्स को जहां थकान वाला बताते हैं वहीं उसकी सबसे ज्यादा महत्व की भी बात करते हैं। उनके मुताबिक सेक्स थकान लाता है। इसकी अवहेलना मत करना। जबतक तुम इसके पागलपन को नहीं जान लेते, तुम इससे छुटकारा नहीं पा सकते।
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प्रेम की सारी यात्रा का प्राथमिक बिंदु सेक्स है
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प्रेम की सारी यात्रा का प्राथमिक बिंदु काम है, सेक्स है। सेक्स की शक्ति ही प्रेम बनती है। सेक्स ऊर्जा का अधोगमन है, नीचे की तरफ बह जाना है, ब्रह्माचर्य ऊर्जा का ऊर्ध्वगमन है, ऊपर की तरफ उठ जाना है। जिस दिन इस देश में सेक्स की सहज स्वीकृति हो जाएगी, उस दिन इतनी बड़ी ऊर्जा मुक्त होगी भारत में कि हम आइंस्टीन पैदा कर सकते हैं।
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ओशो परिवार नियोजन के पक्षधर
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ओशो परिवार नियोजन के पक्षधर हैं। वो कहते हैं कि परिवार नियोजन की बात धीरे-धीरे अनिवार्य हो जानी चाहिए। इसे किसी की स्वेच्छा पर नहीं छोड़ा जा सकता।
जब दो प्रेमी संभोग करते हैं, तोवे परमात्मा के मंदिर से ही गुजरते हैं
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वहीं, पति पत्नी के रिश्तों को बो मंदिर से जोड़ते हैं वो कहते हैं कि पति अपनी पत्नी के पास इस तरह से जाए जैसे कोई मंदिर के पास जाता है, पत्नी अपने पति के पास ऐसे जाए जैसे कोई परमात्मा के पास जाता है क्योंकि जब दो प्रेमी संभोग करते हैं, तो वास्तव में वे परमात्मा के मंदिर से ही गुजरते हैं।