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बड़ी कामयाबी: क्लाइमेट डैमेज फंड को मिली मंजूरी, विकासशील देशों को मिलेगा मुआवजा

Fri, 01 Dec 2023 06:14 AM IST
यशोधन शर्मा वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, दुबई

सार

समझौते के मसौदा में विकसित देशों से फंड में योगदान करने का आग्रह किया गया है। यह अमेरिका और अन्य धनी देशों का एक प्रमुख अनुरोध था, जो चाहते हैं कि संयुक्त राष्ट्र प्रणाली के तहत विकासशील माने जाने वाले उच्च आय वाले देश जैसे सऊदी अरब, यूएई भी इसमें योगदान दें।
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सीओपी28 - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) की अध्यक्षता में आयोजित हो रहे जलवायु शिखर सम्मेलन (सीओपी 28) में बहुचर्चित व बहुप्रतिक्षित जलवायु-नुकसान निधि (क्लाइमेट डैमेज फंड) को आधिकारिक रूप से मंजूरी मिल गई है। इससे दुनियाभर के देश गरीब और विकासशील देशों को जलवायु परिवर्तन की वजह से हो रहे नुकसान के खिलाफ मुआवजा मिलेगा।

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मुआवजे के लिए इस कोष की स्थापना को लेकर लंबे समय से बहस चल रही थी। मसलन, फंड कहां स्थित होगा, किन देशों को लाभ मिलना चाहिए और कौन इसका वित्तपोषण करेगा इन सभी सवालों को हल करते हुए सभी सरकारों के वार्ताकारों ने बृहस्पतिवार को सीओपी-28 की औपचारिक शुरुआत होते ही इस फंड को मंजूरी दे दी। यह अपनी तरह का पहला फंड है, जिसके जरिये जलवायु परिवर्तन से होने वाले नुकसान और क्षति के लिए भुगतान किया जाएगा। खासतौर पर गरीब समुद्री द्वीपीय और अफ्रीकी देशों को इस फंड से समुद्र के बढ़ते जलस्तर, सूखा और बाढ़ जैसे हालात से होने वाले नुकसान के खिलाफ सुरक्षा मिलेगी। 

विकसित देशों से फंड में योगदान का आग्रह
समझौते के मसौदा में विकसित देशों से फंड में योगदान करने का आग्रह किया गया है। यह अमेरिका और अन्य धनी देशों का एक प्रमुख अनुरोध था, जो चाहते हैं कि संयुक्त राष्ट्र प्रणाली के तहत विकासशील माने जाने वाले उच्च आय वाले देश जैसे सऊदी अरब, यूएई भी इसमें योगदान दें।
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समझौते में यह भी कहा गया है यह योगदान स्वैच्छिक होगा। सहमति बनाने में अहम भूमिका बारबाडोस के जलवायु दूत अविनाश ने कहा कि कठिन संघर्ष के बाद यह ऐतिहासिक समझौता हुआ है। हमें पुनर्निर्माण और पुनर्वास के लिए बिना देरी के धन मुहैया कराना होगा।

यूएई ने 10 करोड़ डॉलर दिए
फंड बनाने की शुरुआत करते हुए यूएई ने अपनी तरफ से 10 करोड़ डॉलर का योगदान दिया है। जर्मनी ने भी 10 करोड़ डॉलर के योगदान का एलान किया है। ब्रिटेन ने 7.5 करोड़ डॉलर, अमेरिका ने 1.7 करोड़ डॉलर, जापान ने 1 करोड़ डॉलर के योगदान का एलान किया है। अमेरिका की तरफ से कम योगदान को लेकर काफी आलोचना हो रही है। जबकि, एतिहासिक परिप्रेक्ष्य में अमेरिका दुनिया में सबसे ज्यादा प्रदूषण फैलाने वाले देशों में शामिल रहा है।

अलग फंड की जरूरत
विकासशील देश एक पूरी तरह से नया फंड चाहते थे, जो मौजूदा अंतरराष्ट्रीय संस्थानों से अलग हो। विकासशील देशों का तर्क था कि मौजूदा संस्थान अमीर देशों की बनाई लालफीताशाही से बंधे हुए हैं। वहीं, अमेरिका और अन्य विकसित देशों का कहना था कि नई व्यवस्था और संस्था बनाने से गरीब देशों तक पहुंचने वाला धन कम हो जाएगा।

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