कभी ठेलिया लगाकर जीवन यापन करने वाले सासाराम (बिहार) के दिलीप सिंह आज लखपति ही नहीं, उन्नतिशील किसानों में शुमार हैं। टमाटर, मक्का, मटर, शिमला मिर्च की खेती के बाद अब उन्होंने टमाटर चेरी की पैदावार के जरिये एक नई पहचान बनाई है।
रविवार को टमाटर चेरी की उपज दिखाने के लिए वह बीएचयू के कृषि विज्ञान संस्थान के निदेशक प्रोफेसर आरपी सिंह के पास पहुंचे थे। बीएचयू के कृषि विज्ञान संस्थान से ही दिलीप को टमाटर चेरी की खेती की जानकारी मिली थी। दिलीप को कभी बीएचयू के कृषि विज्ञानियों ने ही ठेले पर सब्जी बेचने के बजाय खेती-किसानी करने के लिए प्रोत्साहित किया था।
रेहन पर खेत लेकर खेती की शुरुआत करने वाले दिलीप अब दूसरों को भी रोजगार मुहैया करा रहे हैं। साथ ही, उन्नतिशील खेती के क्षेत्र में बिहार ही नहीं बल्कि पूर्वी उत्तर प्रदेश के किसानों के लिए भी प्रेरणास्रोत बन गए हैं। दिलीप ने बताया कि फिलहाल उनका फोकस टमाटर चेरी की उपज पर है। बीएचयू के कृषि विज्ञानियों की सलाह पर उन्होंने बंगलूरू की नो यू सीड्स कंपनी से 126 रुपये में इसका दो ग्राम बीज मंगाया था।
ग्रीन हाउस में 50 पौधे जनवरी में लगाए थे। अब पेड़ से फल आने लगे हैं। टमाटर चेरी अंगूर के आकार का संतरे के रंग जैसा होता है। बाजार में इसकी कीमत 150 से 200 रुपये किलो है जबकि बड़े होटलों में 250 से 300 रुपये प्रतिकिलो तक इसकी बिक्री होती है। दिलीप के खेती की खासियत यह है कि वे रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग बिल्कुल नहीं करते।
जैविक खाद से सब्जियों का उत्पादन करते हैं। उन्होंने बताया कि टमाटर चेरी के एक पौधे से 20 से 25 किलो फल निकलता है। बताया कि पौधा नाजुक होता है, ऐसे में ग्रीन हाउस में ही अच्छी पैदावार होती है। खेतों में यह फसल कमजोर और पैदावार काफी कम होती है। बीएचयू के कृषि विज्ञानी अब इस प्रजाति पर शोध करेंगे ताकि इसे सामान्य तौर पर खेतों में भी पैदा किया जा सके।