पश्चिम बंगाल में 15 साल बाद ऐतिहासिक सत्ता परिवर्तन तो हो गया है, लेकिन नई सरकार के लिए यह जीत किसी मखमली सेज नहीं बल्कि कांटों के ताज जैसा है। 20 लाख करोड़ रुपये से बड़ी अर्थव्यवस्था वाले इस राज्य का सरकारी खजाना फिलहाल गहरे दबाव में है। सातवें वेतन आयोग का भारी-भरकम वादा, खाली तिजोरी और 'अन्नपूर्णा भंडार' जैसी लोकलुभावन योजनाएं राज्य के वित्तीय स्वास्थ्य की अंतिम परीक्षा लेने वाली हैं। आइए, आसान सवाल-जवाब में समझते हैं कि बंगाल के आर्थिक हालात क्या हैं और नई सरकार के सामने कितनी बड़ी चुनौतियां मुंह बाए खड़ी हैं।
जवाब: बंगाल की आर्थिक स्थिति बेहद खराब दौर से गुजर रही है। 16वें वित्त आयोग के मूल्यांकन के अनुसार, राज्य का 'कर्ज-GSDP अनुपात' (Debt-to-GSDP ratio) करीब 37% के खतरनाक स्तर पर बना हुआ है। राज्य सरकार की कुल कमाई का लगभग तीन गुना हिस्सा कर्ज के बोझ तले दबा है। सबसे बड़ी चिंता यह है कि सरकार की कुल कमाई का एक बहुत बड़ा हिस्सा सिर्फ कर्मचारियों के वेतन, पेंशन और पुराने कर्जों का ब्याज चुकाने में ही खर्च हो जाता है। राज्य सरकार पुरानी पेंशन योजना चला रही है जिससे आगे चलकर खजाने पर देनदारी और बढ़ेगी।
जवाब: भाजपा ने नई सरकार बनने के 45 दिनों के भीतर सातवां वेतन आयोग लागू करने का वादा किया है । वर्तमान में राज्य सरकार छठे वेतन आयोग (ROPA 2019) के ढांचे पर चल रही है और राज्य व केंद्र के कर्मचारियों व पेंशनरों के महंगाई भत्ते व महंगाई राहत (डीए-डीआर) के बीच 36% से 40% तक की भारी खाई है । सातवें वेतन आयोग को पूरी तरह लागू करने और सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार पुराने डीए-डीआर बकाये को चुकाने का मतलब है कि राज्य के खजाने पर हर साल हजारों करोड़ रुपये (अनुमानित 20,000 से 25,000 करोड़ रुपये) का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा । यह नई सरकार के लिए एक बड़ा वित्तीय झटका साबित होगा। शुभेंदु सरकार इससे कैसे निपटती है यह देखने वाली बात होगी।
जवाब: योजनाओं का पैसा पास करना एक बात है, लेकिन उन्हें धरातल पर उतारना सबसे बड़ी चुनौती है। इसके दो मुख्य कारण हैं:
जवाब: पश्चिम बंगाल में शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व में नई सरकार की सफलता पूरी तरह से कड़े राजकोषीय सुदृढ़ीकरण पर निर्भर करेगी। विशेषज्ञों के अनुसार, सातवें वेतन आयोग को एकमुश्त के बजाय चरणबद्ध तरीके से लागू करना, लोकलुभावन योजनाओं को लक्षित बनाना और सिंडिकेट राज को कुचलकर एमएसएमई व औद्योगिक ढांचे को पुनर्जीवित करना ही एकमात्र व्यावहारिक विकल्प है। डिजिटल गवर्नेंस का उपयोग कर लीकेज रोकना होगा। यदि ये कड़े आर्थिक फैसले नहीं लिए गए, तो बंगाल का यह वित्तीय तनाव एक ऐसे भंवर में तब्दील हो जाएगा, जहां से वापसी लगभग असंभव होगी।