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लॉ कॉलेजों के नियमन पर सुप्रीम कोर्ट सख्त: बीसीआई के अधिकारों पर उठाए क्या सवाल? दो हफ्ते में मांगा जवाब

Wed, 23 Sep 2026 03:33 PM IST
देवेश त्रिपाठी पीटीआई, नई दिल्ली

सार

सुप्रीम कोर्ट ने कानून कॉलेजों और विश्वविद्यालयों के नियमन में बार काउंसिल ऑफ इंडिया की भूमिका पर सवाल उठाते हुए मामले की विस्तृत जांच का संकेत दिया है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने पूछा कि कानूनी शिक्षा के लिए बीसीआई को विशेषज्ञ संस्था किस आधार पर माना जाए। अदालत ने बीसीआई से दो सप्ताह में जवाब मांगा है।
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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स/ANI
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विस्तार
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सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कहा कि वह इस बात की जांच करेगा कि क्या बार काउंसिल ऑफ इंडिया (बीसीआई) के पास लॉ कॉलेजों और विश्वविद्यालयों को नियंत्रित करने का अधिकार है। अदालत ने यह भी कहा कि बीसीआई की वैधानिक भूमिका तभी शुरू होती है, जब लाइसेंस दिया जाता है।
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मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने सवाल किया कि कानून की पढ़ाई को नियंत्रित करने के लिए बीसीआई को विशेषज्ञ संस्था कैसे माना जा सकता है। पीठ ने कहा कि शैक्षणिक मामलों से निपटने के लिए कानून के विद्वान और शिक्षाविद अधिक उपयुक्त हैं।

सीजेआई सूर्यकांत ने बीसीआई के अधिकार पर उठाया क्या सवाल?
मुख्य न्यायाधीश ने मौखिक टिप्पणी में कहा, "बीसीआई लॉ कॉलेजों को कैसे नियंत्रित कर सकता है? यही असली सवाल है। उनकी वैधानिक भूमिका तभी शुरू होती है, जब किसी को लाइसेंस मिलता है। इसलिए सवाल यह है कि क्या कानून स्कूलों को नियंत्रित किया जा सकता है? हम यह जांचना चाहेंगे कि क्या बीसीआई के पास विश्वविद्यालय या कानून कॉलेज को नियंत्रित और विनियमित करने की शक्ति है।"
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उन्होंने आगे कहा, "कानूनी शिक्षा को नियंत्रित करने के लिए बीसीआई विशेषज्ञ संस्था कैसे है? वे कानूनी शिक्षा के बारे में क्या जानते हैं? कानून के जाने-माने विद्वान और शिक्षाविद हैं... आप सामान्य दिशानिर्देश तय कर सकते हैं... पाठ्यक्रम चार या पांच साल का होना चाहिए... लेकिन आप नियंत्रण नहीं कर सकते।"

बीसीआई को नोटिस, दो सप्ताह के भीतर देना होगा जवाब
शीर्ष अदालत बीसीआई-पीईएआरएल फर्स्ट ट्रस्ट के कामकाज और ट्रस्ट की ओर से कानून कॉलेज स्थापित किए जाने पर सवाल उठाने वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी। पीठ ने याचिकाओं पर नोटिस जारी किया और बार काउंसिल ऑफ इंडिया से दो सप्ताह के भीतर जवाब मांगा।

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता गिरीश मित्तल की ओर से पेश अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने कहा कि बीसीआई ने 2016 में एक प्रस्ताव पारित कर पहले के एक ट्रस्ट को खत्म कर दिया था और उसकी राशि एक नए ट्रस्ट को हस्तांतरित कर दी थी। उन्होंने 2020 में बार काउंसिल ऑफ इंडिया ट्रस्ट फॉर प्रमोशन ऑफ एजुकेशन, लीगल एंड प्रोफेशनल रिफॉर्म्स एंड इम्प्रूवमेंट इन रिसर्च के गठन का भी उल्लेख किया।

बीसीआई पर प्रशांत भूषण ने लगाए क्या आरोप?
भूषण ने आरोप लगाया कि ट्रस्ट की डीड में 11 प्रबंध न्यासियों को बीसीआई सदस्य के तौर पर उनके कार्यकाल की परवाह किए बिना "मूल और स्थायी न्यासी" बनाया गया था। उन्होंने कहा कि इसके बाद ट्रस्ट ने गोवा और आंध्र प्रदेश में एक-एक कानून कॉलेज स्थापित किया।

बीसीआई की ओर से पेश वकील ने अदालत को बताया कि बार निकाय ने एक प्रस्ताव पारित किया है, जिसके तहत कोई भी आजीवन न्यासी नहीं होगा। न्यासियों का कार्यकाल बीसीआई में उनकी सदस्यता के कार्यकाल के साथ ही समाप्त होगा।

बीसीआई अध्यक्ष मनन कुमार मिश्रा को लेकर अदालत ने की थी क्या टिप्पणी?
शीर्ष अदालत ने इससे पहले टिप्पणी की थी कि बीसीआई के अध्यक्ष मनन कुमार मिश्रा का पद केवल "प्रो टेम" है, जब तक कि नए सिरे से गठित वकीलों का निकाय अपने पदाधिकारियों का चुनाव नहीं कर लेता। अदालत ने यह भी निर्देश दिया था कि उन्हें कोई भी नीतिगत फैसला भारत के अटॉर्नी जनरल और सॉलिसिटर जनरल से परामर्श के बाद लेना होगा।

इससे पहले मिश्रा के लंबे समय से बीसीआई अध्यक्ष बने रहने की वैधता को चुनौती देते हुए उन्हें पद से हटाने की मांग वाली याचिका दायर की गई थी। अधिवक्ता योगमाया एम. जी. की ओर से दायर याचिका के अनुसार, मिश्रा पहली बार 2012 तक बीसीआई अध्यक्ष चुने गए थे। हालांकि उन्होंने 2014 में कुछ समय के लिए पद छोड़ दिया था, लेकिन उसी साल नवंबर में फिर अध्यक्ष पद पर लौट आए और तब से पद पर बने हुए हैं।

मनन कुमार मिश्रा के पद पर बने रहने को लेकर उठे सवाल
याचिका में कहा गया है कि बीसीआई के नियम 12(2) के तहत अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का कार्यकाल दो साल या सदस्यता समाप्त होने तक होता है, इनमें से जो पहले हो। याचिका में पूर्व सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश या किसी हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक स्वतंत्र समिति गठित करने की मांग की गई है। याचिका में 21 अप्रैल 2025 की उस राजपत्र अधिसूचना को भी चुनौती दी गई है, जिसके तहत मिश्रा का कार्यकाल 2030 तक बढ़ाया गया है।
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