अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायाधिकरण ने भी शुरू की जांच
बांग्लादेश में शेख हसीना सरकार के खिलाफ हिंसक प्रदर्शनों के चलते वे पांच अगस्त को भारत आ गईं। इन प्रदर्शनों में कई छात्रों समेत लगभग 300 लोग मारे गए। वहीं, अल्पसंख्यकों हिंदू समुदायों के घरों-दुकानों और मंदिरों को भी आग लगा दी गई। बांग्लादेश की 170 मिलियन आबादी में हिंदू अभी भी लगभग 8 फीसदी हैं, जो 1947 के मुकाबले लगभग 20 फीसदी से भी कम हैं। बांग्लादेश में 83 साल के डॉ. मोहम्मद युनुस के नेतृत्व में अंतरिम सरकार का गठन होने के बाद शेख हसीना पर हत्या के दो मामलों समेत एक दर्जन से अधिक मामले दर्ज किए हैं। ये मामले हसीना की विरोधी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) के इशारे पर दर्ज किए गए हैं। वहीं अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायाधिकरण के जांच प्रकोष्ठ ने भी विरोध-प्रदर्शनों के दौरान हत्या, यातना और नरसंहार के लिए हसीना समेत दस लोगों के खिलाफ तीसरा मामला शुरू कर दिया है।
शेख हसीना के खिलाफ मामलों की भरमार
पिछले मंगलवार को अपदस्थ प्रधानमंत्री पर जुलाई में हुए हिंसक-प्रदर्शनों के दौरान एक किराना दुकान के कर्मचारी की मौत के मामले में छह अन्य लोगों के साथ हत्या का मामला दर्ज किया गया था। अगले दिन 14 अगस्त को 10 फरवरी 2015 के एक मामले में सुप्रीम कोर्ट के वकील सोहेल राणा ने अपने अपहरण के आरोप में उनके और उनके मंत्रिमंडल के कई पूर्व सदस्यों के खिलाफ जबरन गायब करने का मामला दर्ज कराया। शनिवार को, विरोध प्रदर्शन के दौरान एक छात्र की मौत के सिलसिले में उनके खिलाफ एक और मामला दर्ज किया गया। यह मामला भी सुप्रीम कोर्ट के एक वकील द्वारा आरिफ अहमद सियाम के पिता बुलबुल कबीर की ओर से दायर किया गया था। आरिफ अहमद सियाम कक्षा 9 का छात्र था, जिसकी 5 अगस्त को विरोध प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने गोली मारकर हत्या कर दी थी। कहा जा रहा है कि शेख हसीना के खिलाफ मामले दर्ज करने के लिए पहले अटॉर्नी जनरल मोहम्मद असदुज्जमां से सलाह-मशविरा किया गया होगा, जो सीनियर वकील होने अलावा बीएनपी के सदस्य भी हैं और 2018 में बीएनपी के टिकट पर चुनाव भी लड़ चुके हैं। 8 अगस्त को ही अंतरिम सरकार ने उनकी नियुक्ति की थी। इससे पहले बता दें, कि अंतरिम सरकार बनते ही प्रदर्शनकारियों के हंगामे के बाद बांग्लादेश के चीफ जस्टिस ओबैदुल हसन ने पद से इस्तीफा देने का एलान किया था। शेख हसीना पर ये सभी मामले उनके इस्तीफे के बाद दर्ज किए गए हैं।
भारत-बांग्लादेश के बीच प्रत्यर्पण संधि
लेकिन क्या शेख हसीना को भारत से बांग्लादेश प्रत्यर्पित किया जा सकता है? नई दिल्ली और ढाका के बीच 2013 से प्रत्यर्पण संधि है, जो दोनों देशों को आवश्यकता पड़ने पर दोषियों या विचाराधीन कैदियों की अदला-बदली करने की अनुमति देती है। हालांकि भारत और बांग्लादेश के बीच जो प्रत्यपर्ण संधि हुई है, उसके तहत कुछ भगोड़ों को भारत लाया भी गया है और कुछ को वापस बांग्लादेश भेजा भी गया है। इस संधि के तहत 2015 में यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम (उल्फा) के टॉप लीडर अनूप चेतिया को बांग्लादेश से भारत लाया गया था। वहीं भारत ने भी इस संधि के तहत बांग्लादेश के कुछ भगोड़ों को अपने पड़ोसी देश को सौंपा है।
वहीं, 2016 में, संधि में एक संशोधन और जोड़ा गया, इसके तहत एक साल से ज्यादा की सजा पाए दोषियों की अदला-बदली की अनुमति दी गई, लेकिन यह संशोधन राजनीतिक कैदियों और शरण लेने वाले लोगों पर लागू नहीं होता है। संशोधन में कहा गया है कि अगर अपराध 'राजनीतिक प्रकृति' का है, तो प्रत्यर्पण से इनकार किया जा सकता है। सूत्रों ने बताया कि हसीना के प्रत्यर्पण के लिए बांग्लादेश को भारत सरकार के विदेश मंत्रालय से संपर्क करना होगा, जो प्रत्यर्पण मामलों में सेंट्रल अथॉरिटी है।
शेख हसीना ने शरण के लिए नहीं किया कोई आवेदन
हालांकि, बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) के शीर्ष नेता और पूर्व कैबिनेट मंत्री अब्दुल मोईन खान का कहना है कि दोनों देशों के बीच प्रत्यर्पण संधि शेख हसीना के मामले में लागू नहीं हो सकती है। ऐसा इसलिए क्योंकि नई दिल्ली और ढाका के बीच समझौता राजनीतिक शरणार्थियों के मामले में लागू नहीं होता है। बांग्लादेश के लोग जानते हैं कि कुछ समय के लिए भारत में ही रहेंगी। बता दें, कि शेख हसीना के बेटे सजीब वाजेद ने कहा था कि उनकी मां ने किसी भी देश से राजनीतिक शरण नहीं मांगी है। उन्होंने कहा था कि वे बांग्लादेश जाना चाहती हैं और तुंगीपारा (दक्षिण बांग्लादेश) में अपने गांव के पुश्तैनी घर में रिटायर होना चाहती हैं। यही उनका सपना रहा है। वे बांग्लादेश के बाहर निर्वासन में नहीं रहना चाहतीं। हालांकि भारत सरकार ने अभी तक इस पर अपनी स्थिति स्पष्ट नहीं की है कि शेख हसीना को कैसे और किस आधार पर भारत में जगह दी गई है।
तो क्या हसीना को बांग्लादेश प्रत्यर्पित किया जा सकता है?
वहीं, हसीना अगर भारत में राजनीतिक शरण लेने का दावा करती हैं, तो जिन अपराधों के लिए उन पर मामला दर्ज किया गया है, उनमें से कुछ को संधि में राजनीतिक अपराधों की परिभाषा से बाहर रखा गया है। इसमें हत्या, जबरन गायब कर दिए जाने और यातना के मामले शामिल हैं। संधि के अनुच्छेद 10 (3) में 2016 में किए गए संशोधन ने अनुरोध करने वाले देश के लिए किए गए अपराध का सबूत देने की जरूरत को खत्म कर दिया। जिसके बाद प्रत्यर्पण का अनुरोध करने वाले देश को अपनी अदालत का केवल गिरफ्तारी वारंट पेश करना होगा।
ये आधार कर सकते हैं मदद
वहीं, संधि में प्रत्यर्पण अनुरोधों को अस्वीकार करने के आधार भी बताए गए हैं। संधि के अनुच्छेद 7 में कहा गया है कि प्रत्यर्पण के अनुरोध को अस्वीकार भी किया जा सकता है यदि जिस व्यक्ति का प्रत्यर्पण मांगा गया है, उस पर उस राज्य की अदालतों में प्रत्यर्पण अपराध के लिए मुकदमा चल रहा हो। हालांकि यह हसीना के मामले में लागू नहीं होता है। अनुच्छेद 8 में इनकार के लिए कई आधारों की सूची दी गई है, जिनमें ऐसे मामले शामिल हैं जिनमें आरोप “न्याय के हित में सद्भावनापूर्वक नहीं लगाया गया है” या सैन्य अपराधों के मामले में जो “सामान्य आपराधिक कानून के तहत अपराध नहीं हैं”।
सूत्रों का कहना है कि आम तौर पर आतंकवाद और अन्य हिंसक मामलों के अपवादों के साथ सैन्य या राजनीतिक अपराधों के लिए प्रत्यपर्ण नहीं किया जाता है। मृत्युदंड या आजीवन कारावास वाले मामलों में भी प्रत्यपर्ण नहीं होता है, जब तक कि प्रत्यपर्ण का अनुरोध करने वाला देश इन दंडों को लागू न करने का वचन न दे।
भारत के पास क्या हैं विकल्प?
सूत्रों का कहना है कि भारत चाहे तो हसीना के प्रत्यर्पण को यह कह कर भी अस्वीकार कर सकता है कि उनके खिलाफ लगाए गए आरोप "न्याय के हित में सद्भावनापूर्ण नहीं हैं"। लेकिन ऐसा करने से दोनों देशों के बीच संबंधों में तनाव आ सकता है। सूत्रों का कहना है कि भारत को बांग्लादेश में अपनी दीर्घकालिक रणनीतिक और आर्थिक हितों को सुरक्षित करने पर ध्यान देना होगा। साथ ही, उसे पुरानी दोस्त शेख हसीना के साथ खड़ा होना होगा। इसके लिए भारत को संतुलन बनाए रखना होगा। लेकिन पहले जरूरी है कि अंतरिम सरकार वहां चुनाव कराए और नई संवैधानिक सरकार बनने का रास्ता खोले। प्रत्यपर्ण की प्रक्रिया बेहद लंबी है और इसमें अभी लंबा वक्त लगेगा। उन्होंने कहा कि शेख हसीना के प्रत्यर्पण की मांग को भारत स्वीकार नहीं करेगा। भारत दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने जा रहा है। भारत बांग्लादेश के दबाव के आगे नहीं झुकेगा। भारत के साथ संबंधों में खटास चीन और पाकिस्तान के लिए तो अच्छी बात हो सकती है, लेकिन यह बांग्लादेश के हित में भी नहीं है।
भारत का दुश्मन है ये शख्स!
बांग्लादेश मामलों पर नजर रखने वाले एक सूत्र का कहना है कि शेख हसीना पर ये सभी मामले एक शख्स के इशारे पर दर्ज हो रहे हैं। रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल जहांगीर आलम चौधरी को बांग्लादेश की अंतरिम सरकार में गृह मामलों के सलाहकार के रूप में नियुक्त किया गया है। जिन्होंने ब्रिगेडियर जनरल (सेवानिवृत्त) एम सखावत हुसैन की जगह ली है। 2001-06 के बीच बीएनपी सरकार के दौरान कई मुद्दों पर जहांगीर आलम चौधरी का भारत के साथ टकराव हुआ था। अपनी नियुक्ति के एक दिन बाद ही चौधरी ने 2009 के बांग्लादेश राइफल्स (बॉर्डर गार्ड बांग्लादेश) विद्रोह मामले को भी फिर से खोल दिया। कहा जा रहा है कि वे इसके लिए हसीना को जिम्मेदार ठहरा सकते हैं। वहीं, वे इस मामले में भारत सरकार को सह-साजिशकर्ता के तौर पर भी पेश कर सकते हैं। सूत्रों का कहना है कि बॉर्डर गार्ड बांग्लादेश के पूर्व डीजी जहांगीर आलम चौधरी ने एक बार भारत पर बांग्लादेश विरोधी अलगाववादियों के 90 आतंकवादी शिविरों को पनाह देने का आरोप लगाया था। वे 17 अगस्त, 2005 को बांग्लादेश में हुए ग्रेनेड हमलों के लिए भी भारत को दोषी ठहरा चुके हैं।