मुंबई (उस समय मुंबई को बम्बई कहा जाता था) स्थित कंपनियों को उन्होंने निशाना बनाया था लेकिन दरअसल उनका ये अभियान मुंबई में रह रहे दक्षिण भारतीयों के खिलाफ था क्योंकि शिवसेना के अनुसार जो नौकरियां मराठियों की हो सकती थी उन पर दक्षिण भारतीयों का कब्जा था।
बाल ठाकरे का तर्क था कि जो महाराष्ट्र के लोग हैं उन्हें नौकरी मिलनी चाहिए। इस मुद्दे को मराठियों ने हाथों-हाथ लिया। शिवसेना पर राजनीति में हिंसा और भय के इस्तेमाल का बार-बार आरोप लगा। लेकिन बाल ठाकरे का कहना था, "मैं राजनीति में हिंसा और बल का प्रयोग करूंगा क्योंकि वामपंथियों को यही भाषा समझ आती है और यह कुछ लोगों को हिंसा का डर दिखाना चाहिए तब ही वो सबक सीखेंगे।"
दक्षिण भारतीयों के व्यवसाय, संपत्ति को निशाना बनाया गया और धीरे-धीरे मराठी युवा शिवसेना में शामिल होने लगे। बाल ठाकरे ने अपनी पार्टी का नाम शिवसेना 17वीं सदी के एक जाने माने मराठा राजा शिवाजी के नाम पर रखा था। शिवाजी मुगलों के खिलाफ लड़े थे। बाल ठाकरे ने जमीनी स्तर पर अपनी पार्टी का संगठन बनाने के लिए हिंसा का सहारा लेना शुरू कर दिया। राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों, आप्रवासियों और यहां तक कि मीडियाकर्मियों पर शिवसैनिकों के हमले आम बात हो गई थी। धीरे-धीरे मुंबई के हर इलाक़े में स्थानीय दबंग युवा शिवसेना में शामिल होने लगे।
एक 'गॉडफॉदर' की तरह बाल ठाकरे हर झगड़े सुलझाने लगे। लोगों को नौकरियां दिलवाने लगे और उन्होंने आदेश दे दिए कि हर मामले में उनकी राय ली जाए। यहां तक की फिल्मों के रिलीज में भी उनकी मनमानी चलने लगी।
बाल ठाकरे के जीवन से जुड़ी कई कल्पित कहानियां प्रचलित होने लगीं। कहा गया कि वो जर्मनी के पूर्व तानाशाह हिटलर के प्रशंसक हैं। एक पत्रिका में उनके हवाले से ये खबर दी गई थी लेकिन उन्होंने न तो इसकी पुष्टि की और न ही इसका खंडन किया।
धीरे-धीरे मुंबई म्यूनिसिपल कॉरपोरेशन के चुनाव में उनकी पार्टी का प्रदर्शन बेहतर होने लगा लेकिन अभी भी पार्टी को बड़ी राजनीतिक कामयाबी नहीं मिल पा रही थी। शिवसेना का प्रभाव मुंबई और इसके आस-पास के इलाकों तक ही सीमित है और राज्य के दूसरे इलाकों में पार्टी का कुछ खास असर नहीं है। बाल ठाकरे 80 और 90 के दशक में तेजी से उभरे क्योंकि उस समय हिंदुत्व का मुद्दा सिर चढ़ कर बोल रहा था और ठाकरे कट्टर हिंदुत्व के समर्थक थे।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि शुरूआती दौर में सत्ताधारी कांग्रेस ने शिवसेना को या तो नजरअंदाज किया या फिर कई मामलों में तो वामपंथियों जैसे अपने राजनीतिक विरोधियों को समाप्त करने के लिए शिवसेना को प्रोत्साहित किया। लेकिन 80 के दशक के दौरान शिवसेना एक बड़ी राजनीतिक शक्ति बन गई थी जो राज्य में सत्ता हासिल करने के लिए अपनी दावेदारी पेश कर रही थी। इस दौरान बाल ठाकरे ने दक्षिणपंथी वोटरों को लुभाने के लिए हिंदुत्व का दामन थाम लिया।
1992 में उत्तर प्रदेश के अयोध्या में बाबरी मस्जिद के तोड़े जाने के बाद मुंबई में हिंदु और मुसलमानों के बीच सांप्रदायिक दंगे हुए जो कई हफ्तों तक चले। इन दंगों में शिवसेना और बाल ठाकरे का नाम बार-बार लिया गया। दंगों में कुल 900 लोग मारे गए थे। सैंकड़ों लोगों ने दंगों के बाद मुंबई छोड़ दी और फिर कभी लौट कर नहीं आए।
वर्ष 1992 में जब अयोध्या का विवादित ढांचा गिराया गया था तब भारतीय जनता पार्टी या राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने तो खुलकर जिम्मेदारी नहीं ली। सभी लोगों ने यहां तक कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवकों का इससे कोई लेना देना नहीं है। लेकिन बाल ठाकरे से जब यही सवाल दोहराया गया तो उन्होंने कहा, "हमारे लोगों ने ये गिराया है और मुझे उसका अभिमान है।" उन्होंने एक समय यहां तक कह दिया था, "हिंदू अब मार नहीं खाएंगे, उनको हम अपनी भाषा में जवाब देंगे।"
उन्हें पता था कि इस तरह की भाषा से उन्हें लोगों का समर्थन मिल सकता है और अनेक टीकाकार मानते हैं कि इसी भाषा ने उनके राजनीतिक भविष्य को स्थापित करने में बहुत बड़ी भूमिका निभाई। यही वजह थी कि लोगों के बीच उनके बारे में दिलचस्पी बढ़ने लगी।
उन्होंने कट्टर हिंदुत्व और पाकिस्तान के प्रति जो कट्टरवादी रवैया अपनाया उससे भी समाज के कुछ वर्गों में उन्हें समर्थन मिला। उन्होंने मुसलमानों के विरोध में वकत्व्य दिए। कट्टर हिंदुत्व की बात की। भारत-पाक क्रिकेट पर भी कड़ा रुख अपनाया।
सिर्फ तीन साल के बाद शिवसेना और भारतीय जनता पार्टी मिलकर राज्य में अपनी सरकार बनाने में सफल हो गए। बाल ठाकरे ने अपने एक बहुत ही करीबी नेता को मुख्यमंत्री बनाया और सत्ता की चाबी खुद अपने पास रखी। पिछले एक दशक में शिवसेना का अभियान उत्तर भारत से मुंबई आए आप्रवासियों और धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ हो गया।
ठाकरे एक अच्छे वक्ता थे और लोगों को अपनी मजेदार बातों से खूब आकर्षित करते थे। मुंबई के शिवाजी पार्क में दशहरा के अवसर हर साल होने वाले उनके भाषण का उनके समर्थकों को खूब इंतजार रहता था। जिंदगी के आखिरी बरस वो खराब स्वास्थ के कारण शिवाजी पार्क तो नहीं जा सके लेकिन अपने समर्थकों के लिए उन्होंने वीडियो रिकॉर्डेड संदेश भेजा जिसमें उन्होंने अपने चाहने वालों से अपील की थी कि वे उनके पुत्र और शिवसेना के कार्यकारी अध्यक्ष उद्धव ठाकरे को उतना ही प्यार और सम्मान दें जितना उन्होंने बाल ठाकरे को दिया था।
एक कार्टूनिस्ट के तौर पर बाल ठाकरे ब्रितानी कार्टूनिस्ट डेविड लो को बहुत पसंद करते थे। दूसरे विश्व युद्ध पर डेविड लो के कार्टून बहुत लोकप्रिय हुए थे। मृत्यु से कुछ समय पहले तक ठाकरे अपनी मराठी साप्ताहिक मार्मिक के लिए खुद कार्टून बनाते थे।