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छह दिसंबर 1992 : कहां हैं सुर्खियों में रहे वो महत्वपूर्ण चेहरे

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Thu, 06 Dec 2018 03:02 PM IST
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6 दिसंबर 1992 जब देश में एक उन्माद था तब क्या केंद्र की सरकार और क्या राज्य सरकार सभी लाचार थीं..उस समय लाल कृष्ण आडवाणी इसका मुख्य चेहरा थे जबकि देश में प्रधानमंत्री पी वी नरसिम्हा राव थे। 26 साल बीत जाने के बाद भी 6 दिसंबर की यादें आज भी ताजा हैं। इस दिन देश के कई नेताओं के चेहरे सामने आए जिन्होंने इस पूरे मामले में अहम किरदार निभाया। आइए जानते हैं कि छह दिसंबर के वो सूत्रधार आज कहां है।  

 
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6 दिसंबर 1992 जब देश में एक उन्माद था तब क्या केंद्र की सरकार और क्या राज्य सरकार सभी लाचार थीं..उस समय लाल कृष्ण आडवाणी इसका मुख्य चेहरा थे जबकि देश में प्रधानमंत्री पी वी नरसिम्हा राव थे। 26 साल बीत जाने के बाद भी 6 दिसंबर की यादें आज भी ताजा हैं। इस दिन देश के कई नेताओं के चेहरे सामने आए जिन्होंने इस पूरे मामले में अहम किरदार निभाया। आइए जानते हैं कि छह दिसंबर के वो सूत्रधार आज कहां है।  

 

babri masjid
लाल कृष्ण आडवाणी- 

एल के आडवाणी विवादित ढांचा को ढहाने की कहानी लिखने वाले प्रमुख चेहरों में भी प्रमुख थे। तब वह भाजपा के अध्यक्ष थे अब वह कार्यभार मुक्त हो चुके हैं। भारतीय जनता पार्टी देशभर में अपनी धमक बढ़ाने की ओर आगे बढ़ रही थी। 1984 में हुए आम चुनाव में पार्टी ने सिर्फ दो सीटें ही जीती थीं जबकि 1989 तक पार्टी की पहचान और उसके मुद्दों ने लोगों को प्रभावित कर लिया था जिसके बाद पार्टी ने 80 सीटों पर जीत हासिल की थी। एल के आडवाणी उस समय पार्टी अध्यक्ष थे और उन्होंने देश में एक रथयात्रा निकाली जिसका दो परिणाम निकले, एक विवादित बाबरी मस्जिद ढांचा का ढहाया जाना और दूसरा भाजपा की धमक देश में देखने को मिली। 

वातानुकूलित आधुनिक रथ से निकली आडवाणी की यात्रा ने लोगों को एकजुट करने में अहम भूमिका निभाई। यह यात्रा आडवाणी ने सोमनाथ मंदिर गुजरात से शुरू की थी। इस यात्रा को आडवाणी खत्म तो अयोध्या में करना चाहते थे लेकिन उनके रथ को लालू प्रसाद यादव जो बिहार के मुख्यमंत्री थे उन्होंने रथ को रोक लिया। और उनके आदेश  के बाद आडवाणी को गिरफ्तार कर लिया गया। लेकिन तब तक पार्टी ने अपना मकसद पूरा कर लिया था। 1991 के चुनाव में भाजपा ने 100 से अधिक का आंकड़ा पार कर लिया था। जब छह दिसंबर 1992 को मस्जिद गिराई गई तब आडवाणी भी दूसरे भाजपा नेताओं के साथ वहां मौजूद थे और कार सेवकों में जोश भरने के लिए भाषण दे रहे थे। 

1996 में भाजपा अपने मकसद में पूरी तरह से कामयाब हो चुकी थी और वह इस चुनाव में अबतक की सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभर चुकी थी। 13 दिनों की सरकार बनाकर इसने एक इतिहास भी रच दिया था। 1998 में पार्टी एकबार फिर सत्ता में आई और नेशनल डेमोक्रेटिक अलाएंस (राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन) के साथ सरकार बनाई। इस सरकार में आडवाणी गृहमंत्री और उप प्रधानमंत्री  बने। लेकिन 2004 और 2009 के चुनाव में भाजपा हारती गई, इस चुनाव में     आडवाणी को प्रधानमंत्री के रूप में प्रोजेक्ट किया गया था। लेकिन जैसे-जैसे नरेंद्र मोदी का प्रभाव बढ़ता गया वैसे-वैसे आडवाणी पार्टी में दरकिनार होते चले गए। 

आज क्या कर रहे हैं आडवाणी- इन दिनों पार्टी में आडवाणी साइडलाइन कर दिए गए हैं। अब पार्टी में उनका कोई अहम रोल नहीं रह गया है।

 

राजस्थान के गवर्नर कल्याण सिंह - फोटो : amar ujala
कल्याण सिंह-

कल्याण सिंह उस समय उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे। आज- वह राजस्थान में गवर्नर हैं

कल्याण सिंह उस समय मुख्यमंत्री थे और बाबरी मस्जिद के सुरक्षा की जिम्मेदारी उनकी ही सरकार की थी। लेकिन सिंह की प्रतिष्ठा  6 दिसंबर को लेकर उनकी स्थिति भ्रामक रही तब जब उन्होंने विधानसभा में बाबरी मस्जिद के ढांचे की सुरक्षा को लेकर आश्वासन दिया था। यही नहीं उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में ढांचें की सुरक्षा को लेकर चार मुद्दों का शपथपत्र दाखिल किया था। यहां तक की उन्होंने कहा था कि मस्जिद परिसर में सिर्फ प्रतीकात्मक  कार सेवकों को ही जाने की अनुमति दी जाएगी। 

 आज क्या कर रहे हैं-

कल्याण सिंह ने बाबरी मस्जिद ढहाए जाने के कुछ घंटों के भीतर ही अपने पद से इस्तीफा दे दिया था। उसके बाद वह 1997 में एकबार फिर से यूपी के मुख्यमंत्री बने और 1999 तक रहे।  उन्होंने 2009 में पार्टी छोड़ दी और समाजवादी पार्टी में शामिल हो गए। यही नहीं 2010 में उन्होंने खुद की जन क्रांति पार्टी का निर्माण किया और 2013 में पार्टी का विलय भाजपा के साथ कर दिया। फिलहाल वह राजस्थान के गवर्नर हैं।

पूर्व प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव
पीवी नरसिम्हा राव- तब- देश के प्रधानमंत्री थे, अब- 2004 में उनका निधन हो गया   
1992 में केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी। उस समय देश के प्रधानमंत्री पी वी नरसिम्हा राव थे, उनपर आरोप है कि जब देश में उन्माद की स्थिति बन रही थी तब वह मूक दर्शक बने बैठे रहे। राव देश के नौवें प्रधानमंत्री थे। उनके ही कार्यकाल में देश की अर्थव्यवस्था ने उदारीकरण की ओर कदम बढ़ाया था। उनकी इस पहल पर बाबरी मस्जिद के गिराए जाने की वजह से गहरा आघात लगा। 

उनपर यह आरोप लगा कि उन्होंने इसके रोकथाम के लिए यूपी सरकार पर कोई भी दवाब नहीं डाला। उन्होंने इसके बचाव के लिए कोई अहम कदम नहीं उठाया।बाबरी मस्जिद मामले में विश्व हिंदू परिषद ने अक्तूबर 1990 में ही छह दिसंबर 1992 को कारसेवा की घोषणा कर दी थी। राव ने भी इस मामले में कई मीटिंग बुलाई लेकिन किसी नतीजे पर नहीं पहुंचे।

कल्याण सिंह जो तत्कालीन मुख्यमंत्री थे उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में मस्जिद की सुरक्षा को लेकर कई मुद्दे बताए। लेकिन आखिर में विवादित ढांचा बाबरी मस्जिद को ढहाने से रोका नहीं जा सका। 
2004 में नरसिंहा राव का निधन हो गया।
 

लालू प्रसाद यादव
लालू प्रसाद यादव
बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री, आज- राष्ट्रीय जनता दल के अध्यक्ष

वह लालू प्रसाद यादव ही थे जिन्होंने एल के आडवाणी के रथ को बिहार में रोक दिया था। लालू के आदेश पर समस्तीपुर में धार्मिक सौहार्दता बिगाड़ने के आरोप में गिरफ्तारी का आदेश दिया। 

आज लालू यादव जेल में हैं। उनपर चारा घोटाले से जुड़े कई आरोप सिद्ध हुए हैं जिसके बाद वह रांची की जेल में सजा काट रहे हैं। 
 

uma bharti
उमा भारती
तब- भाजपा की नेता थीं, आज -केंद्रीय मंत्री हैं

उमा भारती की पहचान राम जन्मभूमि मूवमेंट के बाद ही बनी थी। वह भाजपा की चंद नेताओं में से एक थीं जो बाबरी विध्वंस के दौरान अयोध्या में मौजूद थीं। बाबरी विध्वंस की जांच कर रहे लिब्राहन आयोग ने कार सेवकों को उकसाने का आरोपी माना। 

आज- उमा मध्यप्रदेश की 2003-04 में मुख्यमंत्री रहीं। भारती के राजनीतिक जीवन में कई उतार चढ़ाव देखा लेकिन आज वह केंद्र सरकार में मंत्री हैं। पिछले दिनों उन्होंने घोषणा की है कि वह आगामी आम चुनाव नहीं लड़ेंगी।

ashok singhal
अशोक सिंघल- तब- विश्व हिंदू परिषद के मुखिया थे। 
अब-2015 में उनका निधन हो गया


अशोक सिंघल को राम मंदिर मूवमेंट का आर्किटेक्ट कहा जाता है। अशोक सिंघल  राम मंदिर मूवमेंट का अहम चेहरा थे। उन्होंने 1980 में ही अयोध्या मूवमेंट को जगा दिया था।
1984 में राम जानकी रथ यात्रा लांच किया था, उन्होंने तब मांग रखी थी कि बाबरी मस्जिद के बंद दरवाजे को खोला जाए।  सिंघल आडवाणी और वाजपेयी दोनों के करीबी माने जाते थे। 6 दिसंबर को अशोक सिंघल भी मौजूद थे। 

सिंघल का निधन 2015 में हो गया था। 
 
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