विदेश मंत्री एस जयशंकर ने रविवार को अंतरराष्ट्रीय मंच पर वैश्विक दक्षिण (Global South) के असमान प्रतिनिधित्व को रेखांकित किया और विश्वसनीय आपूर्ति श्रृंखलाओं के साथ अधिक विविधतापूर्ण और लोकतांत्रिक प्रणाली सुनिश्चित करने के लिए पुन: वैश्वीकरण पर जोर दिया। जयशंकर ने बी20 शिखर सम्मेलन में बोलते हुए जोर देकर कहा कि व्यवसाय वास्तविक अंतर ला सकते हैं क्योंकि दुनिया को अब उत्पादन के कई केंद्रों की आवश्यकता है। जयशंकर यहां बिजनेस-20 शिखर सम्मेलन के दौरान 'उभरती दुनिया 2.0' में ग्लोबल साउथ की भूमिका पर एक सत्र को संबोधित कर रहे थे।
बिजनेस-20 (बी-20) वैश्विक व्यापार समुदाय के साथ आधिकारिक रूप से जी-20 का संवाद मंच है। इस वर्ष शिखर सम्मेलन का विषय 'R.A.I.S.E: रिस्पॉन्सिबल, एक्सीलेरेटेड, इनोवेटिव, सस्टेनेबल, इक्विटेबल बिजनेस' है। बी-20 के तीन दिवसीय कार्यक्रम का समापन रविवार को हुआ। अपने संबोधन के दौरान उन्होंने यह भी कहा कि कैसे कोविड-19 महामारी और यूक्रेन संघर्ष ने विकासशील देशों पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता पर जोर दिया है।
जयशंकर ने कहा, "यह एक निर्विवाद वास्तविकता है कि अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था पर वैश्विक उत्तर (Global North) का प्रभुत्व बना हुआ है। यह स्वाभाविक रूप से जी-20 की संरचना में प्रतिबिंबित होता है। हमने देखा है कि महामारी ने दुनिया भर में भीषण तबाही मचाई, ऐसे में विकासशील देशों पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता बढ़ गई है। कोरोना का प्रभाव खत्म भी नहीं हुआ था कि यूक्रेन के संघर्ष के परिणामों ने वैश्विक खाद्य, ईंधन और उर्वरक सुरक्षा ने जटिलता को और बढ़ा दिया।"
विदेश मंत्री ने कहा कि व्यापार व्यवधान, उच्च ब्याज दर और बढ़ते जलवायु संकट ने बढ़ते तनाव में एक अतिरिक्त फैक्टर के रूप में योगदान दिया है। उन्होंने कहा, वैश्विक दक्षिण पर वर्तमान फोकस इस दृढ़ विश्वास से बना हुआ है कि ये वे देश हैं जो वास्तव में विशेष देखभाल के पात्र हैं, लेकिन इन देशों में असाधारण तनाव में जीने वाले लोग भी शामिल हैं। यदि इस पर ध्यान नहीं दिया गया तो यह विश्व अर्थव्यवस्था के लिए एक गंभीर समस्या बन जाएगी।
यह टिप्पणी करते हुए कि "वैश्वीकरण दोनों तरीकों से कटौती करता है", जयशंकर ने कहा कि मुख्य रूप से वैश्वीकरण के सकारात्मक पहलुओं पर ध्यान केंद्रित किया गया है, लेकिन इसके नकारात्मक पहलुओं का भी प्रभाव पड़ता है। उन्होंने कहा, चर्चा काफी हद तक इसके (वैश्वीकरण) सकारात्मक पहलुओं पर केंद्रित रही है, लेकिन इस बात पर भी विचार करें कि पोषण, स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार और यहां तक कि सुरक्षा में मंदी का हम सभी उत्तर या दक्षिण पर क्या प्रभाव पड़ता है? और वास्तव में तब, जब डिजिटलीकरण और तकनीकी के दावे कम पड़ जाते हैं।
उन्होंने कहा, अब प्रयास ऐसे पुन: वैश्वीकरण की तलाश करना है जो अधिक विविधतापूर्ण हो, जो अधिक लोकतांत्रिक हो, जहां केवल उपभोग के नहीं बल्कि उत्पादन के भी कई केंद्र हों और यहीं व्यवसाय महत्वपूर्ण अंतर ला सकता है। हम उन कुछ आपूर्तिकर्ताओं की दया पर निर्भर नहीं रह सकते जिनकी व्यवहार्यता पर अप्रत्याशित झटकों के कारण प्रश्नचिह्न लग गया है। उन्होंने यह भी बताया कि भारत ग्लोबल साउथ के उद्देश्य को आगे बढ़ाने के लिए कैसे काम कर रहा है। गौरतलब है कि भारत ने जनवरी 2023 में 'वॉयस ऑफ द ग्लोबल साउथ' समिट का आयोजन किया था।
डिजिटल बुनियादी ढांचा जलवायु परिवर्तन से निपटने में मददगार : नीलेकणि
इन्फोसिस के सह-संस्थापक नंदन नीलेकणि ने डिजिटल बुनियादी ढांचे के आर्थिक-सामाजिक फायदे गिनाए। कहा, दुनियाभर में सराहा जा रहा यह नजरिया जलवायु परिवर्तन से निपटने व वैश्विक तापमान में कमी लाने में भी मददगार साबित होगा। उन्होंने कहा, भारत ने अपने भागीदारी मॉडल के साथ जिम्मेदार विनियमन और नवाचार के बीच संतुलन साधा है।
वहीं, आईटीसी के अध्यक्ष संजीव पुरी ने कहा कि वैश्विक स्तर पर मौसम की घटनाओं की तीव्रता लगातार बढ़ रही है। इसे देखते हुए व्यवसायों को रणनीति बनानी चाहिए।