अगस्ता वेस्टलैंड केस 'उत्तराखंड गेट' से घिरे दिख रहे भारतीय जनता पार्टी को सांस लेने का मौका देगा, साथ ही अगले तीन साल तक भारतीय राजनीति को गरमा कर रखेगा।
भले ही नतीजा वैसा ही फुस्स हो, जैसा अब तक होता रहा है। चिंता की बात यह है कि इससे सामान्य नागरिक के मन में प्रशासन और राजनीति के प्रति नफरत बढ़ेगी।
इसे घटनाक्रमों के साथ जोड़ें तो सीबीआई, प्रवर्तन निदेशालय, राष्ट्रीय जांच एजेंसी और दूसरी खुफिया एजेंसियों की साख मिट्टी में मिलती नजर आ रही है।
बिचौलिए क्रिश्चियन माइकेल ने अगस्ता वेस्टलैंड के भारत में सक्रिय अधिकारियों को जो दिशा-निर्देश दिए हैं, उनसे सवाल उठता है कि क्या कारण है कि नामी उत्पादक भी भारत में ‘घूस’ को जरूरी मानते हैं? और मीडिया को मैनेज करने की बात सोचते हैं?
भारतीय जनता पार्टी की दिलचस्पी व्यक्तिगत रूप से सोनिया गांधी और राहुल गांधी में है। उसका गणित है कि कांग्रेस को ध्वस्त करना है तो 'परिवार' को निशाना बनाओ।
भ्रष्टाचार के इस प्रकार के आरोपों से रक्षा में कांग्रेस को जेडीयू, आरजेडी, सपा और वाम मोर्चा का समर्थन नहीं मिलेगा। जिनके साथ मिलकर पार्टी बीजेपी के खिलाफ मोर्चा बनाना चाहती है।
फिलहाल इस वर्चुअल मोर्चे को बीजेपी के साथ कांग्रेस की भी आलोचना करनी होगी।
उत्तराखंड मामले को लेकर सरकार संसद के चालू सत्र में घिरी हुई थी। अब उसे कांग्रेस पर जवाबी हमला बोलने का मौका मिला है।
हालांकि इटली की अदालत ने यह फैसला सात अप्रैल को दिया था पर इसका राजनीतिक मतलब समझने में दिल्ली ने करीब तीन हफ्ते लगाए। या कुछ सोचकर इस पर तब चर्चा शुरू की जब संसद का सत्र चल रहा था।
ऐसे विवादों की माइलेज अच्छी होती है। बोफोर्स और हवाला मामले लंबे समय तक भारतीय राजनीति को प्रभावित करते रहे। यह मामला भी यूपी और पंजाब चुनाव से लेकर 2019 के लोकसभा चुनाव तक चलना चाहिए।
सिर्फ भाजपा ही नहीं कांग्रेस और बाक़ी दल अपनी सुविधा से इसकी अलग-अलग पूंछ पकड़ रहे हैं। कांग्रेस का कहना है कि ये गांधी परिवार को निपटाने की साजिश है। इसके लिए उसने बिचौलिए क्रिश्चियन माइकेल की चिट्ठी का सहारा लिया है।