दूसरी ओर प्रदेश अध्यक्ष सचिन पायलट हैं जो लंबे समय से राज्य में कांग्रेस की जमीन तैयार करने में जुटे थे। दोनों ही नेता राहुल के करीबी हैं कसौटी पर खरे हैं। लिहाजा राहुल की कोशिश इन नेताओं के बीच आपसी तालमेल से समाधान निकालने की है। बावजूद दोनों ही मजबूती से अपने-अपने दावे पर अड़े हैं। मंगलवार शाम को जयपुर में प्रभारी अविनाश पांडेय ने दोनों नेताओं के साथ बैठक भी की लेकिन बेनतीजा रही।
मध्यप्रदेश में नतीजों की तस्वीर और भी ज्यादा धूमिल है और भाजपा वहां सरकार बनाने का मौका तलाश रही है। लिहाजा आपसी घमासान से पहले कांग्रेस की कोशिश राज्य में अपने अंकगणित मजबूत करने की है। कमलनाथ को राहुल ने दिल्ली से मध्यप्रदेश भेजा तो इसी नीयत से था कि आखिरी राजनीतिक पारी राज्य में ही खेलें लेकिन ज्योतिरादित्य सिंधिया पिछले विधानसभा चुनाव से इसी आस में हैं कि उन्हें कमान सौंपी जाए।
फिलहाल दिग्विजय सिंह का समर्थन कमलनाथ के साथ और राज्य के कुछ अन्य बड़े नेता खुद चुनाव हार चुके हैं लिहाजा बहुमत सिद्ध करने के खेल में पार्टी कमलनाथ को बेहतर मानकर चल रही है। बुधवार को मध्य प्रदेश के विधायकों की भी बैठक बुलाने को कहा गया है जिसमें दिल्ली से कुछ वरिष्ठ नेता भेजे जा सकते हैं।