मध्यप्रदेश में हालांकि कांग्रेस दो सीटों से पूर्ण बहुमत नहीं पा सकी, लेकिन यहां के परिणाम उनके लिए काफी संतुष्टिदायक होंगे। यहां भी स्थिति राजस्थान की तरह ही रहने वाली है। मध्यप्रदेश में कांग्रेस सरकार बनाने का कोई मौका नहीं छोड़ा चाहती है, इसके लिए उसने राज्यपाल से मिलने का समय भी मांगा। कांग्रेस समझ रही है कि 2019 में ये राज्य खासकर मध्यप्रदेश कितना महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।
बात करें मिजोरम की तो यहां कांग्रेस यहां सत्ता से बाहर हो गई। हालांकि यहां की हार के घाव को छत्तीसगढ़ व राजस्थान में जीत ने भर दिया। भले ही यहां की राजनीति पर लोगों का ज्यादा ध्यान न गया हो लेकिन, ध्यान देने वाली बात यह भी है कि कांग्रेस के मुख्यमंत्री ललथनहवला को दोनों विधानसभा सीटों पर हार मिली। 40 विधानसभा सीटों वाले इस राज्य में 26 सीटें एमएनएफ के खाते में गईं और कांग्रेस की झोली में सिर्फ पांच। मिजोरम का परिणाम यूं भले ही कांग्रेस के लिए इतना दुखद न लग रहा हो लेकिन यह कांग्रेस के लिए एक सीख की तरह है कि सत्ता मिलना और उसे बरकरार रखना दोनों बहुत अलग चीजें हैं।
पांच राज्यों के चुनाव में अगर कहीं सत्ता परिवर्तन नहीं हुआ तो वह है तेलंगाना। यहां टीआरएस प्रमुख केसीआर (के चंद्रशेखर राव) के सिर एक बार फिर ताज सजा है। राज्य में जल्द विधानसभा चुनाव कराने का उनका दावा सफल साबित हो गया। ध्यान देने वाली बात यह है कि तेलंगाना में ये पहले विधानसभा चुनाव थे। टीआरएस की गुलाबी आंधी में राज्य की दूसरी पार्टियां धूल चाटती नजर आईं।
विधानसभा चुनावों के परिणाम तो कांग्रेस के लिए खुशखबरी लाए ही हैं, इसके साथ ही कांग्रेस के लिए एक और उपलब्धि है और वह हैं राहुल गांधी। आज की प्रेस कांफ्रेंस में राहुल गांधी पहले से बदले नजर आए। अब आत्मविश्वास उनकी बातों में झलकने लगा है, साथ ही वह खुद को एक कुशल राजनीतिज्ञ के तौर पर प्रोजेक्ट करने में भी सफल दिखे। प्रेस कांफ्रेंस में राहुल गांधी का यह कहना कि कांग्रेस इन राज्यों में भाजपा के कार्यों को आगे ले जाएगी... स्पष्ट करता है कि वह लीक पर चलने वाली राजनीति नहीं करने वाले। कांग्रेस अध्यक्ष का यह रुख कांग्रेस के लिए सकारात्मक साबित होगा यह तो तय है, देखना यह है कि गांधी को लोकसभा चुनाव में देश की जनता कितना स्वीकार करेगी।
विधानसभा चुनावों के परिणाम भारतीय जनता पार्टी के लिए चेतावनी हैं। भाजपा को स्वाध्याय की कितनी आवश्यकता है यह परिणामों ने स्पष्ट कर दिया है। भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दोनों के माथे पर चिंता की लकीरें खिंच गई हैं ये तो साफ है। जैसा कि वित्तमंत्री अरुण जेटली ने कहा कि यह हमारे लिए ठहराव लेने और अपना परीक्षण करने का समय है। जेटली का कथन इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि मोदी-शाह के जादू में अब वह दम नहीं रहा जो पिछले लोकसभा चुनाव में दिखा था। यह जादू लोकसभा चुनाव 2019 में कारगर साबित होता है या फेल ये तो भविष्य ही बताएगा, लेकिन अपनी स्थिति का आकलन भाजपा के लिए जरूरी है, ये साफ हो गया है।