स्वामी प्रसाद मौर्य के सपा में शामिल होने के दौरान सपा कार्यालय में जुटी भीड़।
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कोरोना के बेलगाम हो जाने के कारण चुनाव आयोग ने उत्तर प्रदेश समेत पांचों राज्यों में चुनावी रैलियों, रोड शो और जनसभाओं पर लगी पाबंदी 22 जनवरी तक बढ़ा दी है। इसके लिए शनिवार को नया आदेश जारी कर दिया गया है। अब तक यह पाबंदी 15 जनवरी यानी आज शनिवार तक के लिए थी। चुनाव आयोग 22 जनवरी को फिर स्थिति की समीक्षा करेगा, तब तक राजनीतिक दलों को डिजिटल प्रचार करना ही एक विकल्प होगा।
चुनाव आयोग ने राजनीतिक दलों को आगह किया है कि वह कोरोना गाइडलाइन का सख्ती से पालन करें वहीं राज्य और जिला निर्वाचन अधिकारी को यह सख्त ताकीद दी गई है कि वह राजनीतिक दलों, नेताओं और जनता पर अपनी निगाहें रखें। ऐसे में सवाल है कि क्यों आयोग को रैली-रोड शो पर पाबंदी लगाने की मियाद फिर बढ़ानी पड़ी है? क्या राजनीतिक पार्टियां स्वयं संयम और अनुशासन का पालन करके मिसाल नहीं पेश कर सकती हैं?
ब्रिटेन का उदाहरण देखें
लॉकडाउन के दौरान ड्रिंक्स पार्टी में शामिल होने की बात स्वीकार करने के बाद ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन पर इस्तीफे का दबाव पड़ रहा है। ब्रिटेन की एक प्रमुख सट्टा कंपनी ने कथित तौर पर दावा किया है कि कोरोना महामारी के दौरान शराब पार्टी को लेकर 57 वर्षीय प्रधानमंत्री पर इस्तीफे का दबाव पड़ा है। यह दबाव केवल विपक्ष की तरफ से ही नहीं बल्कि जॉनसन की पार्टी कंजर्वेटिव पार्टी की तरफ से भी है। दूसरी तरफ भारत का उदाहरण लें तो यहां कोरोना महामारी के दौरान नेता और राजनीतिक पार्टियां खुलकर कोरोना गाइडलाइन का उल्लंघन करती हैं और उन पर कोई वैसी सख्ती नहीं होती जो आम जनता के लिए सबक साबित हो।
सपा में शामिल हुए स्वामी प्रसाद मौर्य व अन्य
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सपा कार्यालय में जो हुआ उसने कई सवाल खड़े किए
कोरोना महामारी के बीच पांच राज्यों में विधानसभा चुनावों की घोषणा हो चुकी है। इन राज्यों में चुनावी बिसात के साथ कोरोना के मामले भी तेजी से बढ़ रहे हैं। लेकिन शुक्रवार को लखनऊ में सपा के कार्यालय में कार्यकर्ताओं की भीड़ ने कई सवाल खड़े किए। स्वामी प्रसाद मौर्य और अन्य नेताओं के पार्टी ज्वाइन करने के समय कोरोना नियमों की जमकर धज्जियां उड़ाई गईं। क्या पुलिस और स्थानीय प्रशासन को पहले इस बात की खबर नहीं लगी?
मीडिया में विवाद बढ़ने के बाद करीब ढ़ाई हजार सपा नेताओं पर एफआईआर दर्ज की गई है। पार्टी के नेताओं के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 188, 269, 270 और 341 के तहत महामारी रोग अधिनियम की संबंधित धाराओं के साथ प्राथमिकी दर्ज की गई है। लेकिन सवाल यही है कि अगर ब्रिटेन में प्रधानमंत्री को इस्तीफा देने के लिए विवश किया जा रहा है तो फिर भारत में नेता जवाबदेह क्यों नहीं है?
कर्नाटक कांग्रेस की पदयात्रा
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गाइडलाइन का पालन करना ही होगा
विशेषज्ञों का मानना है कि चुनावी राज्यों में नेताओं का चुनाव प्रचार का अधिकार है लेकिन उन्हें कोरोना गाइडलाइंस का पालन भी करना पड़ेगा। कर्नाटक हाई कोर्ट के फैसले को इसी नजरिए से देखा जा रहा है। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में राज्य सरकार को कर्नाटक के सभी जिलों में चार जनवरी 2022 को कोरोना की रोकथाम के लिए जारी किए गए दिशानिर्देश को सख्ती से लागू करने के आदेश जारी किए हैं।
हाईकोर्ट ने सरकार को राज्य में किसी भी रैली, धरने और अन्य राजनीतिक आयोजनों पर रोक लगाने के निर्देश दिए है। हालांकि कर्नाटक में चुनाव नहीं हो रहे और न ही कोई पार्टी यहां चुनाव प्रचार कर रही है लेकिन बढ़ते कोरोना के मामले और राज्य सरकार की ओर से लागू की गई पाबंदी के बाद भी राज्य में कांग्रेस कावेरी नदी पर मेकेदातु परियोजना को लागू करने की मांग को लेकर दस दिवसीय पदयात्रा निकाल रही थी और जिसमें जबरदस्त भीड़ जुट रही थी।
कांग्रेस की मैराथन रैली की तस्वीर (फाइल फोटो)
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सख्ती समय की मांग
एक पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त का मानना है कि राजनीतिक पार्टियां अपने सामाजिक उत्तरदायित्व से भी बंधी हैं, इसलिए उन्हें हर हाल में कोरोना गाइडलाइन का पालन करना चाहिए। नेता और जनता कोई भी हो, सार्वजनिक स्वास्थ्य और सामाजिक दायित्व के प्रति अपने मुंह नहीं मोड़ सकती, इसलिए चुनाव आयोग के लिए सख्ती करना समय की मांग है। पिछले साल पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव के दौरान शुरुआत में आयोग ने अपने कर्तव्यों के निर्वाह में थोड़ी कोताही बरती थी जिसका हमें गंभीर खामियाजा उठाना पड़ा था।
नियमों का पालन कैसे होगा?
यह ठीक है कि चुनाव प्रचार करना नेताओं का अधिकार है लेकिन उनके ऊपर कोरोना काल के नियम भी लागू होते हैं। तो फिर इन नियमों का पालन कैसे होगा और नेताओं और पार्टियों की कानूनी जवाबदेही क्या रहेगी? चुनाव आयोग की क्या भूमिका रहेगी? क्या समर्थकों द्वारा नियमों को तोड़े जाने के लिए नेताओं और पार्टियों को जिम्मेदार माना जा सकता है? इस बारे में हमने सुप्रीम कोर्ट के वकील, साइबर लॉ एक्सपर्ट और ‘अनमास्किंग वीआईपी’ पुस्तक के लेखक विराग गुप्ता से बातचीत की और इन सारे सवालों के जवाब तलाशे हैं।
Prayagraj News : पटेल संस्थान में बसपा की रैली में मौजूद कार्यकर्ता (फाइल फोटो)
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अधिकारी सस्पेंड हों, नेताओं से जुर्माना वसूला जाए
चाहे शुक्रवार को लखनऊ कार्यालय में जुटी भीड़ को देख लें या इससे पहले कोरोनाकाल में हुए अन्य चुनावों को, हमने सभी पार्टियों की रैलियों और रोड शो में स्टार प्रचारकों, प्रत्याशियों और समर्थकों की भीड़ के जरिए डंके की चोट पर कानून को धता बताते हुए देखा। चुनावी रैली और रोड शो में भाग लेने वाले नेता पूरे देश में कोरोना के सबसे बड़े वाहक बन गए थे। चुनावी रैलियों में नेताओं की गुनहगारी साबित करने के लिए लाइव टीवी के फुटेज का भंडार होने के बावजूद, उनका कोई बाल भी बांका नहीं हुआ।
जबकि कायदे से जहां भी नेता कोरोना नियमों का उल्लंघन करें, वहां पर पुलिस अधिकारियों को सस्पेंड किया जाना चाहिए और चुनाव अधिकारियों से जवाब मांगा जाना चाहिए। मास्क नहीं पहनने वाले नेता सोशल डिस्टेंसिंग को धता बताकर भीड़ के आयोजन के लिए जिम्मेदार पार्टियों से आम जनता की तर्ज पर भारी जुर्माना वसूला जाए तो देश की अर्थव्यवस्था वी शेप के रूट से जल्द उबर जाएगी।
बंगाल में स्मृति ईरानी की रैली (फाइल फोटो)
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पार्टियों ने रैली-रोड शो पर पाबंदी के लिए चुनाव आयोग को मजबूर किया?
रोड शो का बढ़ता चलन चुनावी नियमों के विरुद्ध होने के साथ गैरकानूनी भी है। कोरोना काल में हुए रैलियों और रोड शो में सोशल डिस्टेंसिंग और मास्क का पालन नहीं होने से चुनाव आयोग की नियामक व्यवस्था पूरी तरह से ध्वस्त हो गई थी। पिछले साल पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव हुए तो हमने शुरुआत में चुनाव आयोग को कुंभकर्णी नींद में देखा। इसलिए सियासी दलों और उम्मीदवारों ने चुनावी रैलियों और रोड शो में कोरोना गाइडलाइन का बेरोकटोक उल्लंघन किया।
जब कोरोना के मामले बढ़ने लगे तब जाकर आयोग की नींद टूटी। मौजूदा वक्त में कोरोना की तीसरी लहर लगभग आ ही चुकी है ऐसे में चुनाव आयोग ने रैली-रोड शो पर पाबंदी लगाकर लोकहित में काम किया है। चुनाव आयोग को पांच राज्यों के हो रहे चुनाव में नियमों के सख्त और ठोस अनुपालन कराने की जरूरत है।
चुनाव आयोग
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चुनाव आयोग को और क्या करना चाहिए
गंगासागर के मेले और अन्य धार्मिक आयोजनों में नियमों का पालन कराने के सख्त आदेश हैं। उसी तरीके से चुनावी रैलियों में नेता, समर्थक और भीड़ के ऊपर वैक्सीनेशन, मास्क, सोशल डिस्टेंसिंग आदि नियमों का पालन कराने की जिम्मेदारी चुनावी काल में चुनाव आयोग के ऊपर है। जिस उम्मीदवार और पार्टी द्वारा नियमों का उल्लंघन हो, उसके खिलाफ सख्त कारवाई करने के लिए चुनाव आयोग के पास पर्याप्त अधिकार हैं। स्थानीय पुलिस और चुनाव अधिकारियों को चुनाव आयोग को सख्त निर्देश देना चाहिए। अगर पार्टी के स्तर पर नियमों का उल्लंघन हो तो पार्टी को कारण बताओ नोटिस भी जारी किया जा सकता है। भीड़ की संख्या के अनुसार पार्टी और नेता के ऊपर अगर एक बार सामूहिक जुर्माना लग गया तो बाकी नेता खुद ही नियमों का पालन करने लगेंगे।
सीएम योगी की रैली पहुंचे लोग (फाइल फोटो)
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राजनीतिक पार्टियां क्या करें कि वर्चुअल रैली फिजिकल रैली में न बदले
राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों के ऊपर नियमों के पालन की जिम्मेदारी है। अनेक मामलों पर आयोजकों की कानूनी जवाबदेही पुलिस और अदालतों ने तय किया है। इसलिए यह ध्यान रखना राजनीतिक पार्टियों का काम है कि वर्चुअल रैली फिजिकल रैली में न बदले, जैसा कि शुक्रवार को सपा कार्यालय में हुआ था। अगर बगैर अनुमति किसी भी तरह से वर्चुअल रैली फिजिकल रैली में बदलती है तो उसे गैरकानूनी मानते हुए जिम्मेदार नेताओं के खिलाफ आईपीसी की धाराओं और चुनावी कानूनों के तहत कारवाई होनी चाहिए।
वर्चुअल रैली में भी भीड़ न जुटे इसके लिए स्थानीय प्रशासन को क्या करना चाहिए
चुनावी राज्यों में डिजास्टर मैनेजमेंट के साथ चुनावी आचार संहिता लागू है। नेता और पार्टी उन नियमों का पालन करें, उसे सुनिश्चित कराने की जिम्मेदारी स्थानीय प्रशासन की है। चुनाव लड़ने वाले नेता और पार्टी के लोग संविधान के तहत शपथपत्र देते हैं इसलिए चुनाव प्रचार के समय नियम और कानून मानने की उनके ऊपर विशेष जिम्मेदारी बनती है। नियम तोड़ने पर आम जनता के ऊपर जैसे कारवाई होती है, उसी तरीके से नेताओं और उम्मीदवारों के खिलाफ एफआईआर और जेल भेजने की कारवाई हो तो कानून का शासन सही मायने में लागू होगा।